सरस्वतीतीर्थानुक्रमः — बलरामस्य तीर्थयात्रा
Sarasvatī Tīrtha Itinerary — Balarāma’s Pilgrimage
यज्ञार्थ चक्रतुश्निन्तां तथा वित्तार्थमेव च । तयोबुद्धि: समभवत् त्रितं गृह्य परंतप,राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत-से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें
yajñārthaṃ cakratuś cintāṃ tathā vittārtham eva ca | tayoḥ buddhiḥ samabhavat tritaṃ gṛhya parantapa rājan ||
বৈশম্পায়নে ক’লে—যজ্ঞফল আৰু ধনলাভ—উভয় উদ্দেশ্যে সেই দুজন ভায়ে চিন্তা কৰিবলৈ ধৰিলে। তেতিয়া তেওঁলোকৰ বুদ্ধিত এই নিশ্চয় জন্মিল—“হে ৰাজন, পৰন্তপ, ত্ৰিতক লগত লৈ আমি যজমানসকলৰ যজ্ঞ সম্পাদন কৰাওঁ; দক্ষিণাৰূপে বহু পশু লাভ কৰি মহাফলদায়ক যজ্ঞৰ অনুষ্ঠান কৰোঁ; আৰু তাতেই হর্ষচিত্তে সোমপান কৰোঁ।”
वैशम्पायन उवाच