Adhyaya 3
Mahaprasthanika ParvaAdhyaya 338 Verses

Adhyaya 3

Adhyāya 3: Indra’s Invitation and Yudhiṣṭhira’s Refusal to Abandon the Dog (Svargārohaṇa Test)

Upa-parva: Svargārohaṇa-saṃvāda (Indra–Yudhiṣṭhira Dialogue on Ascending to Heaven)

Vaiśaṃpāyana describes Indra’s thunderous arrival and invitation for Yudhiṣṭhira to mount the celestial chariot. Seeing his companions fallen, Yudhiṣṭhira requests that his brothers and Draupadī be allowed to accompany him and refuses to seek svarga alone. Indra replies that they have already reached the divine realm after casting off mortal bodies and assures Yudhiṣṭhira of bodily ascent. A further dispute arises over a dog that has remained devoted: Indra urges abandonment, citing heavenly exclusion and alleged loss of merit associated with dogs. Yudhiṣṭhira counters with a structured ethical argument: abandoning a devotee is a grave sin, comparable (in his framing) to major transgressions such as betrayal and harm to protected persons; moreover, he distinguishes his earlier “leaving” of the dead from abandoning the living dependent. Dharma then reveals approval, praising Yudhiṣṭhira’s compassion and recalling earlier tests (e.g., Dvaita-vana episode), declaring his unmatched status and confirming his attainment. Devas and ṛṣis accompany him; Nārada publicly attests the rarity of bodily ascent. Yudhiṣṭhira reiterates his wish to go wherever his brothers and Draupadī have gone, refusing isolated bliss.

Chapter Arc: भाइयों और द्रौपदी के पतन के बाद भी युधिष्ठिर का पग नहीं रुकता; पर स्वर्ग-मार्ग पर देवेन्द्र का साक्षात् आगमन कथा को दिव्य न्यायालय में बदल देता है। → युधिष्ठिर अपने गिरे हुए भ्राताओं को देखकर शोकाकुल होकर इन्द्र से विनती करता है कि वे भी साथ स्वर्ग जाएँ; इन्द्र उत्तर देता है कि वे देह त्यागकर पहले ही स्वर्ग पहुँच चुके हैं, पर युधिष्ठिर को इसी शरीर सहित स्वर्ग-प्रवेश का अधिकार है—एक शर्त के साथ। → इन्द्र जब श्वान को छोड़ देने का संकेत देता है, तब युधिष्ठिर धर्म-प्रतिज्ञा पर अडिग होकर कहता है कि यह श्वान उसका भक्त और शरणागत है; वह उसे त्यागकर स्वर्ग नहीं जाएगा—और वह चार महापापों के समकक्ष ‘भक्त-त्याग’ को मानता है। → युधिष्ठिर स्पष्ट करता है कि उसे अन्य लोक नहीं चाहिए; उसे वही स्थान स्वीकार है जो उसके भ्राताओं और द्रौपदी को मिला है—शुभ हो या पाप। वह देवेन्द्र से पुनः कहता है कि उनके बिना वह वहाँ ठहर नहीं सकता और वहीं जाना चाहता है जहाँ वे गए हैं। → युधिष्ठिर की अडिग करुणा और धर्म-निष्ठा के सामने देवेन्द्र का अगला निर्णय क्या होगा—स्वर्ग का द्वार श्वान सहित खुलेगा या परीक्षा और कठोर होगी?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत गहाप्रस्थानिकपर्वमें द्रौपदी आदिका पतनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥/ २ ॥ अपन क्ाा छा अर: तृतीयो<थध्याय: इन्द्र और धर्म आदिके साथ वार्तालाप, बिक बने धर्ममें दृढ़ रहना तथा सदेह स्वर्गमें जाना वैशम्पायन उवाच ततः सन्नादयन्‌ शक्रो दिवं भूमिं च सर्वश: । रथेनोपययोौ पार्थमारोहेत्यब्रवीच्च तम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर आकाश और पृथ्वीको सब ओरसे प्रतिध्वनित करते हुए देवराज इन्द्र रथके साथ युधिष्ठिरके पास आ पहुँचे और उनसे बोले --'कुन्तीनन्दन! तुम इस रथपर सवार हो जाओ'

বৈশম্পায়নে ক’লে— “তাৰ পাছত শক্র (ইন্দ্ৰ) আকাশ আৰু পৃথিৱীক সকলো দিশে প্ৰতিধ্বনিত কৰি ৰথসহ পাৰ্থ (যুধিষ্ঠিৰ)ৰ ওচৰলৈ আহি ক’লে— ‘কুন্তীনন্দন, এই ৰথত আৰোহণ কৰা।’”

Verse 2

स्वभातृन्‌ पतितान्‌ दृष्टवा धर्मराजो युधिष्ठिर: । अब्रवीच्छोकसंतप्त: सहस्राक्षमिदं वच:,अपने भाइयोंको धराशायी हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर शोकसे संतप्त हो इन्द्रसे इस प्रकार बोले--

নিজ ভ্ৰাতৃসকলক পতিত দেখি ধৰ্মৰাজ যুধিষ্ঠিৰ শোকত দগ্ধ হৈ সহস্ৰাক্ষ (ইন্দ্ৰ)ক এইদৰে ক’লে—

Verse 3

भ्रातर: पतिता मे>त्र गच्छेयुस्ते मया सह । न विना क्षातृभि: स्वर्गमिच्छे गन्तुं सुरेश्वर,'देवेश्वर! मेरे भाई मार्गमें गिरे पड़े हैं। वे भी मेरे साथ चलें, इसकी व्यवस्था कीजिये; क्योंकि मैं भाइयोंके बिना स्वर्गमें जाना नहीं चाहता इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि युधिष्ठिरस्वर्गारोहे तृतीयो5ध्याय:

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে দেৱেশ্বৰ! মোৰ ভাতৃসকল ইয়াত পথত পতিত হৈছে। তেওঁলোকো মোৰ সৈতে একেলগে যাব পৰাকৈ ব্যৱস্থা কৰক; কিয়নো ভাতৃবিহীন স্বৰ্গত প্ৰৱেশ কৰিবলৈ মই ইচ্ছুক নহয়।

Verse 4

सुकुमारी सुखारहा च राजपुत्री पुरंदर । सास्माभि: सह गच्छेत तद्‌ भवाननुमन्यताम्‌,'पुरन्दर! राजकुमारी द्रौपदी सुकुमारी है। वह सुख पानेके योग्य है। वह भी हमलोगोंके साथ चले, इसकी अनुमति दीजिये”

বৈশম্পায়নে ক’লে—হে পুরন্দৰ! ৰাজকুমাৰী দ্ৰৌপদী সুকুমাৰী, সুখৰ অৰ্হা। অনুগ্ৰহ কৰি অনুমতি দিয়ক—সেও যেন আমাৰ সৈতে যায়।

Verse 5

शक्र उवाच भ्रातृन्‌ द्रक्ष्यसि स्वर्गे त्वमग्रतस्त्रिदिवं गतान्‌ । कृष्णया सहितान्‌ सर्वान्‌ मा शुचो भरतर्षभ,इन्द्रने कहा--भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे सभी भाई तुमसे पहले ही स्वर्गमें पहुँच गये हैं। उनके साथ द्रौपदी भी है। वहाँ चलनेपर वे सब तुम्हें मिलेंगे

শক্ৰ (ইন্দ্ৰ) ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! শোক নকৰিবা। তোমাৰ ভাতৃসকল তোমাৰ আগতেই ত্ৰিদিৱলৈ গমন কৰিছে; কৃষ্ণা (দ্ৰৌপদী) সহিতে তেওঁলোক সকলোকে তুমি স্বৰ্গত দেখিবা।

Verse 6

निक्षिप्य मानुषं देहं गतास्ते भरतर्षभ | अनेन त्वं शरीरेण स्वर्गे गन्ता न संशय:,भरतभूषण! वे मानवशरीरका परित्याग करके स्वर्गमें गये हैं; किंतु तुम इसी शरीरसे वहाँ चलोगे, इसमें संशय नहीं है

ইন্দ্ৰে ক’লে—হে ভৰতর্ষভ! তেওঁলোকে মানৱ দেহ ত্যাগ কৰি স্বৰ্গলৈ গৈছে; কিন্তু তুমি এই দেহেৰে স্বৰ্গলৈ যাবা—ইয়াত কোনো সন্দেহ নাই।

Verse 7

युधिछिर उवाच अयं श्वा भूतभव्येश भक्तो मां नित्यमेव ह | स गच्छेत मया सार्धमानृशंस्या हि मे मति:

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—এই কুকুৰটো ভূত-ভৱিষ্যততেও সদায় মোৰ প্ৰতি ভক্ত হৈ আছে। সিও মোৰ সৈতে যাওক; কিয়নো মোৰ সংকল্প কৰুণা আৰু অহিংসাত প্ৰতিষ্ঠিত।

Verse 8

युधिष्ठिर बोले--भूत और वर्तमानके स्वामी देवराज! यह कुत्ता मेरा बड़ा भक्त है। इसने सदा ही मेरा साथ दिया है; अतः यह भी मेरे साथ चले--ऐसी आज्ञा दीजिये; क्योंकि मेरी बुद्धिमें निष्ठरताका अभाव है ।। शक्र उवाच अमर्त्यत्वं मत्समत्वं च राजन्‌ श्रियं कृत्स्नां महतीं चैव सिद्धिम्‌ । संप्राप्तोड्द्य स्वर्गसुखानि च त्वं त्यज श्वान॑ नात्र नृशंसमस्ति

শক্ৰ (ইন্দ্ৰ) ক’লে—হে ৰাজন! আজি তুমি অমৰত্ব, মোৰ সমতা, সম্পূৰ্ণ ঐশ্বৰ্য আৰু মহাসিদ্ধি লাভ কৰিছা। স্বৰ্গসুখো তুমি প্ৰাপ্ত হৈছা; সেয়ে এই কুকুৰটোক ত্যাগ কৰা। ইয়াত কোনো নিষ্ঠুৰতা নাই।

Verse 9

इन्द्रने कहा--राजन! तुम्हें अमरता, मेरी समानता, पूर्ण लक्ष्मी और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई है, साथ ही तुम्हें स्वर्गीय सुख भी उपलब्ध हुए हैं; अतः इस कुत्तेको छोड़ो और मेरे साथ चलो। इसमें कोई कठोरता नहीं है ।। युधिछिर उवाच अनार्यमार्येण सहस्ननेत्र शक्‍्यं कर्तु दुष्करमेतदार्य । मा मे श्रिया सड़मनं तयास्तु यस्या: कृते भक्तजनं त्यजेयम्‌,युधिष्ठिर बोले--सहसनेत्रधारी देवराज! किसी आर्यपुरुषके द्वारा निम्न श्रेणीका काम होना अत्यन्त कठिन है। मुझे ऐसी लक्ष्मीकी प्राप्ति कभी न हो जिसके लिये भक्तजनका त्याग करना पड़े

যুধিষ্ঠিৰ ক’লে—হে সহস্ৰনেত্ৰ দেৱৰাজ! এজন আৰ্য পুৰুষৰ বাবে অনাৰ্য কৰ্ম কৰা অতি দুষ্কৰ; ই আৰ্যৰ যোগ্য নহয়। যাৰ বাবে ভক্তজনক ত্যাগ কৰিব লাগে, তেনে শ্ৰী যেন কেতিয়াও মোৰ লগত নাযায়।

Verse 10

इन्द्र उवाच स्वर्गे लोके श्ववतां नास्ति घिष्ण्य- मिष्टापूर्त क्रोधवशा हरन्ति । ततो विचार्य क्रियतां धर्मराज त्यज श्वानं नात्र नृशंसमस्ति

ইন্দ্ৰ ক’লে—হে ধৰ্মৰাজ! স্বৰ্গলোকত কুকুৰ পোহা লোকৰ বাবে স্থান নাই। ‘ক্ৰোধবশ’ নামৰ ৰাক্ষসে তেওঁলোকৰ যজ্ঞ আৰু ইষ্টাপূৰ্তৰ পুণ্য হৰণ কৰে। সেয়ে বিবেচনা কৰি সিদ্ধান্ত লোৱা—কুকুৰটোক ত্যাগ কৰা; ইয়াত কোনো নিষ্ঠুৰতা নাই।

Verse 11

इन्द्रने कहा--धर्मराज! कुत्ता रखनेवालोंके लिये स्वर्गलोकमें स्थान नहीं है। उनके यज्ञ करने और कुआँ, बावड़ी आदि बनवानेका जो पुण्य होता है उसे क्रोधवश नामक राक्षस हर लेते हैं; इसलिये सोच-विचारकर काम करो। छोड़ दो इस कुत्तेको। ऐसा करनेमें कोई निर्दयता नहीं है ।। युधिछिर उवाच भक्त त्यागं प्राहुरत्यन्तपापं तुल्यं लोके ब्रह्मुवध्याकृतेन । तस्मान्नाहं जातु कथंचनाद्य त्यक्ष्याम्येनं स्वसुखार्थी महेन्द्र,युधिष्ठिर बोले--महेन्द्र! भक्तका त्याग करनेसे जो पाप होता है, उसका अन्त कभी नहीं होता--ऐसा महात्मा पुरुष कहते हैं। संसारमें भक्तका त्याग ब्रह्महत्याके समान माना गया है; अतः मैं अपने सुखके लिये कभी किसी तरह भी आज इस कुत्तेका त्याग नहीं करूँगा

যুধিষ্ঠিৰ ক’লে—হে মহেন্দ্ৰ! ভক্তক ত্যাগ কৰা অতি পাপ বুলি মহাত্মাসকলে কয়; আৰু জগতত তাক ব্ৰাহ্মণহত্যাৰ সমান বুলি ধৰা হয়। সেয়ে মোৰ নিজৰ সুখৰ বাবে মই আজি কোনোভাবেই এই কুকুৰটোক ত্যাগ নকৰোঁ।

Verse 12

भीतं भक्त नान्यदस्तीति चार्त॑ प्राप्तं क्षीणं रक्षणे प्राणलिप्सुम्‌ । प्राणत्यागादप्यहं नैव मोक्तुं यतेयं वै नित्यमेतद्‌ व्रतं मे,जो डरा हुआ हो, भक्त हो, मेरा दूसरा कोई सहारा नहीं है--ऐसा कहते हुए आर्तभावसे शरणमें आया हो, अपनी रक्षामें असमर्थ--दुर्बल हो और अपने प्राण बचाना चाहता हो, ऐसे पुरुषको प्राण जानेपर भी मैं नहीं छोड़ सकता; यह मेरा सदाका व्रत है

যি ভীত, ভক্ত, ‘আপোনাৰ বাহিৰে মোৰ আন কোনো আশ্ৰয় নাই’ বুলি আৰ্তভাবে শৰণলৈ আহিছে, দুৰ্বল, আত্মৰক্ষাত অক্ষম আৰু প্ৰাণ বচাব বিচাৰে—এনে জনক মই প্ৰাণ ত্যাগ কৰিব লাগিলেও ত্যাগ কৰিব নোৱাৰোঁ। এইয়েই মোৰ নিত্য ব্ৰত।

Verse 13

इन्द्र रवाच शुना दृष्ट क्रोधवशा हरन्ति यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च । तस्माच्छुनस्त्यागमिमं कुरुष्व शुनस्त्यागाद्‌ प्राप्स्यसे देवलोकम्‌,इन्द्रने कहा--वीरवर! मनुष्य जो कुछ दान, यज्ञ, स्वाध्याय और हवन आदि पुण्यकर्म करता है, उसपर यदि कुत्तेकी दृष्टि भी पड़ जाय तो उसके फलको क्रोधवश नामक राक्षस हर ले जाते हैं; इसलिये इस कुत्तेका त्याग कर दो। कुत्तेको त्याग देनेसे ही तुम देवलोकमें पहुँच सकोगे

ইন্দ্ৰই ক’লে—বীৰশ্ৰেষ্ঠ! মানুহে দান, যজ্ঞ, স্বাধ্যায় আৰু হোম আদি পুণ্যকৰ্মে যি ফল অৰ্জন কৰে, তাত কুকুৰৰ দৃষ্টি মাত্ৰ পৰিলেও ‘ক্ৰোধবশ’ নামৰ দানৱীয় শক্তিয়ে ক্ৰোধবশত সেই ফল হৰণ কৰে। সেয়ে এই কুকুৰটোক ত্যাগ কৰা; কুকুৰ ত্যাগ কৰিলেই তুমি দেৱলোক লাভ কৰিবা।

Verse 14

त्यक्त्वा भ्रातृन्‌ दयितां चापि कृष्णां प्राप्तो लोक: कर्मणा स्वेन वीर | श्वानं चैनं न त्यजसे कथं नु त्यागं कृत्स्नं चास्थितो मुहा[से5द्य,वीर! तुमने अपने भाइयों तथा प्यारी पत्नी द्रौपदीका परित्याग करके अपने किये हुए पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप देवलोकको प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्तेको क्यों नहीं त्याग देते? सब कुछ छोड़कर अब कुत्तेके मोहमें कैसे पड़ गये

ইন্দ্ৰই ক’লে—বীৰ! তুমি তোমাৰ ভাতৃসকলক আৰু প্ৰিয় কৃষ্ণা (দ্ৰৌপদী)কো ত্যাগ কৰি, নিজৰ কৰ্মৰ পুণ্যফলে দেৱলোক লাভ কৰিছা। তেন্তে এই কুকুৰটোক কিয় ত্যাগ নকৰা? সম্পূৰ্ণ ত্যাগ গ্ৰহণ কৰি এতিয়া কুকুৰৰ মোহত কেনেকৈ বিভ্ৰান্ত হ’লা?

Verse 15

युधिछिर उवाच न विद्यते संधिरथापि विग्रहो मृतैर्मत्यैरिति लोकेषु निष्ठा । न ते मया जीवयितुं हि शक्‍्या- स्ततस्त्यागस्तेषु कृतो न जीवताम्‌,युधिष्ठिरने कहा--भगवन्‌! संसारमें यह निश्चित बात है कि मरे हुए मनुष्योंके साथ न तो किसीका मेल होता है न विरोध ही। द्रौपदी तथा अपने भाइयोंको जीवित करना मेरे वशकी बात नहीं है; अतः मर जानेपर मैंने उनका त्याग किया है, जीवितावस्थामें नहीं

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—ভগৱন! জগতত এইটো স্থিৰ সত্য যে মৃত মানুহৰ সৈতে না সন্ধি হয়, না বৈৰ। দ্ৰৌপদী আৰু মোৰ ভাতৃসকলক জীৱিত কৰা মোৰ সাধ্য নহয়; সেয়ে তেওঁলোক মৃত্যুবৰণ কৰাৰ পাছতেই মই তেওঁলোকক এৰি দিছোঁ—জীৱিত অৱস্থাত নহয়।

Verse 16

भीतिप्रदानं शरणागतस्य स्त्रिया वधो ब्राह्मणस्वापहार: । मित्रद्रोहस्तानि चत्वारि शक्र भक्तत्यागश्चनैव समो मतो मे

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে শক্র! শৰণাগতক ভয় দেখোৱা, নাৰীহত্যা, ব্ৰাহ্মণৰ ধন অপহৰণ, আৰু মিত্ৰদ্ৰোহ—এই চাৰিটা মহাপাপ। কিন্তু মোৰ মতে ভক্তক ত্যাগ কৰাও সেইবোৰৰ সমানেই ঘোৰ।

Verse 17

शरणमें आये हुए को भय देना, स्त्रीका वध करना, ब्राह्मणका धन लूटना और मित्रोंके साथ द्रोह करना--ये चार अधर्म एक ओर और भक्तका त्याग दूसरी ओर हो तो मेरी समझमें यह अकेला ही उन चारोंके बराबर है ।। वैशग्पायन उवाच तद्‌ धर्मराजस्य वचो निशम्य धर्मस्वरूपी भगवानुवाच । युधिष्ठिरं प्रीतियुक्तो नरेन्द्र श्ल_्ष्णै्वाक्यै: संस्तवसम्प्रयुक्तै:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरका यह कथन सुनकर कुत्तेका रूप धारण करके आये हुए धर्मस्वरूपी भगवान्‌ बड़े प्रसन्न हुए और राजा युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए मधुर वचनोंद्वारा उनसे इस प्रकार बोले--

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—শৰণাগতক ভয় দেখোৱা, নাৰীহত্যা, ব্ৰাহ্মণৰ ধন লুট কৰা আৰু মিত্ৰদ্ৰোহ—এই চাৰিটা অধৰ্ম এক ফালে; আৰু আন ফালে ভক্তক ত্যাগ—মোৰ মতে সেই একেটাই চাৰিটাৰ সমান। বৈশম্পায়নে ক’লে—হে জনমেজয়! ধৰ্মৰাজ যুধিষ্ঠিৰৰ এই বাক্য শুনি, কুকুৰৰ ৰূপ ধৰি অহা ধৰ্মস্বৰূপ ভগৱান অতি প্ৰসন্ন হ’ল। তেওঁ ৰজা যুধিষ্ঠিৰক প্ৰশংসা কৰি, কোমল আৰু প্ৰশস্তিময় বাক্যৰে এইদৰে উত্তৰ দিলে।

Verse 18

धर्मरज उवाच अभिजातोऊसि राजेन्द्र पितुर्व॒त्तेन मेधया । अनुक्रोशेन चानेन सर्वभूतेषु भारत,साक्षात्‌ धर्मराजने कहा--राजेन्द्र! भरतनन्दन! तुम अपने सदाचार, बुद्धि तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति होनेवाली इस दयाके कारण वास्तवमें सुयोग्य पिताके उत्तम कुलमें उत्पन्न सिद्ध हो रहे हो

ধৰ্মৰাজে ক’লে—হে ৰাজেন্দ্ৰ, হে ভৰতবংশধৰ! তোমাৰ সদাচাৰ, মেধা আৰু সকলো জীৱৰ প্ৰতি এই কৰুণাৰ দ্বাৰা তুমি সত্যই সুকুলজাত—উত্তম পিতৃবংশৰ যোগ্য বুলি প্ৰমাণিত।

Verse 19

पुरा द्वैतवने चासि मया पुत्र परीक्षित: । पानीयार्थे पराक्रान्ता यत्र ते भ्रातरो हता:

ধৰ্মৰাজে ক’লে—পুত্ৰ! আগতে দ্বৈতবন অৰণ্যত মই তোমাক পৰীক্ষা কৰিছিলোঁ; যেতিয়া তুমি পানী আনিবলৈ দৃঢ় সংকল্পে গৈছিলা, সেই ঠাইতে য’ত তোমাৰ ভাতৃসকল হতা হৈ পৰি আছিল।

Verse 20

बेटा! पूर्वकालमें द्वैतववनके भीतर रहते समय भी एक बार मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी; जब कि तुम्हारे सभी भाई पानी लानेके लिये उद्योग करते हुए मारे गये थे ।। भीमार्जुनौ परित्यज्य यत्र त्वं भ्रातरावुभौ । मात्रो: साम्यमभीप्सन्‌ वै नकुलं जीवमिच्छसि

ধৰ্মৰাজে ক’লে—বৎস! আগতে দ্বৈতবনত থাকোঁতে মই তোমাক পুনৰ পৰীক্ষা কৰিছিলোঁ; পানী আনিবলৈ চেষ্টা কৰোঁতে তোমাৰ ভাতৃসকল হতা হৈ পৰি আছিল। তাত ভীম আৰু অৰ্জুন—তোমাৰ সহোদৰ—ক এৰি, দুয়ো মাতৃৰ প্ৰতি সমতা কামনা কৰি তুমি নকুলক জীৱিত ৰাখিবলৈ ইচ্ছা কৰিছিলা।

Verse 21

उस समय तुमने कुन्ती और माद्री दोनों माताओंमें समानताकी इच्छा रखकर अपने सगे भाई भीम और अर्जुनको छोड़ केवल नकुलको जीवित करना चाहा था ।। अयं श्वा भक्त इत्येवं त्यक्तो देवरथस्त्वया । तस्मात्‌ स्वर्गे न ते तुल्य: कश्चिदस्ति नराधिप:

ধৰ্মৰাজে ক’লে—সেই সময় কুন্তী আৰু মাদ্ৰী—দুয়ো মাতৃৰ প্ৰতি সমভাৱ ৰাখি তুমি ভীম আৰু অৰ্জুনক এৰি কেৱল নকুলক জীৱিত ৰাখিবলৈ বাছনি কৰিছিলা। আৰু “এই শ্বান ভক্ত” বুলি কোৱা সত্ত্বেও তুমি তাক ত্যাগ কৰা নাছিলা; দেৱৰাজৰ ৰথো তুমি পৰিত্যাগ কৰিছিলা। সেয়ে, হে নৰাধিপ! স্বৰ্গত তোমাৰ সমান কোনো নাই।

Verse 22

इस समय भी “यह कुत्ता मेरा भक्त है” ऐसा सोचकर तुमने देवराज इन्द्रके भी रथका परित्याग कर दिया है; अतः स्वर्गलोकमें तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा नहीं है ।। अतस्तवाक्षया लोका: स्वशरीरेण भारत । प्राप्तोडसि भरतश्रेष्ठ दिव्यां गतिमनुत्तमाम्‌,भारत! भरतश्रेष्ठ! यही कारण है कि तुम्हें अपने इसी शरीरसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई है। तुम परम उत्तम दिव्य गतिको पा गये हो

ধৰ্মৰাজে ক’লে—এতিয়াও “এই শ্বান মোৰ ভক্ত” বুলি ভাবি তুমি দেৱৰাজ ইন্দ্ৰৰ ৰথো পৰিত্যাগ কৰিলা। সেয়ে, হে নৰাধিপ! স্বৰ্গত তোমাৰ সমান আন কোনো নাই। এই কাৰণেই, হে ভাৰত, হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! তুমি এই দেহসহ অক্ষয় লোক লাভ কৰিলা; তুমি অনুত্তম দিৱ্য গতিত উপনীত হ’লা।

Verse 23

वैशम्पायन उवाच ततो धर्मक्ष शक्रश्न मरुतश्षाश्विनावपि । देवा देवर्षयश्चैव रथमारोप्य पाण्डवम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--यों कहकर धर्म, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, देवता तथा देवर्षियोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिक्तो रथपर बिठाकर अपने-अपने विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। वे सब-के-सब इच्छानुसार विचरनेवाले, रजोगुणशून्य पुण्यात्मा, पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्मवाले तथा सिद्ध थे

বৈশম্পায়নে ক’লে—তাৰ পাছত ধৰ্ম, শক্ৰ (ইন্দ্ৰ), মৰুতগণ, দুয়ো অশ্বিনীকুমাৰ, আৰু দেৱ-দেৱৰ্ষিসকলে পাণ্ডৱ যুধিষ্ঠিৰক ৰথত আৰোহণ কৰালে। তেওঁক যথোচিত সন্মান জনাই, তেওঁলোকে নিজ নিজ বিমানেৰে স্বৰ্গলোকলৈ প্ৰস্থান কৰিলে।

Verse 24

प्रययु: स्वैर्विमानैस्ते सिद्धा: कामविहारिण: । सर्वे विरजस: पुण्या: पुण्यवाग्बुद्धिकर्मिण:,वैशम्पायनजी कहते हैं--यों कहकर धर्म, इन्द्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, देवता तथा देवर्षियोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिक्तो रथपर बिठाकर अपने-अपने विमानोंद्वारा स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। वे सब-के-सब इच्छानुसार विचरनेवाले, रजोगुणशून्य पुण्यात्मा, पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्मवाले तथा सिद्ध थे

সেই সিদ্ধসকলে নিজ নিজ বিমানেৰে প্ৰস্থান কৰিলে। তেওঁলোক ইচ্ছামতে বিচৰণ কৰিব পৰা, ৰজোগুণৰ ধূলিৰহিত, পুণ্যস্বভাৱী আৰু পবিত্ৰ বাক্য, বুদ্ধি আৰু কৰ্মে সমৃদ্ধ আছিল।

Verse 25

स तं रथं समास्थाय राजा कुरुकुलोदवह: । ऊर्ध्वमाचक्रमे शीघ्रं तेजसा55वृत्य रोदसी,कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर उस रथमें बैठकर अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करते हुए तीव्र गतिसे ऊपरकी ओर जाने लगे

কুৰুবংশৰ শ্ৰেষ্ঠ ৰজা যুধিষ্ঠিৰ সেই ৰথত আৰোহণ কৰি, নিজৰ তেজেৰে পৃথিৱী আৰু আকাশ আৱৰি, দ্ৰুতগতিত ঊৰ্ধ্বদিশলৈ উঠিবলৈ ধৰিলে।

Verse 26

ततो देवनिकायस्थो नारद: सर्वलोकवित्‌ | उवाचोच्चैस्तदा वाक्‍्यं बृहद्वादी बृहत्तपा:,उस समय सम्पूर्ण लोकोंका वृत्तान्त जाननेवाले, बोलनेमें कुशल तथा महान्‌ तपस्वी देवर्षि नारदजीने देवमण्डलमें स्थित हो उच्च स्वरसे कहा--

তেতিয়া দেৱসমূহৰ মাজত অৱস্থিত, সকলো লোকৰ বৃত্তান্ত জনা, বাক্‌পটু আৰু মহাতপস্বী দেৱৰ্ষি নাৰদে উচ্চস্বৰে ক’লে।

Verse 27

ये5पि राजर्षय: सर्वे ते चापि समुपस्थिता: । कीर्ति प्रच्छाद्य तेषां वै कुरुराजो5धितिष्ठति,“जितने राजर्षि स्वर्गमें आये हैं, वे सभी यहाँ उपस्थित हैं, किंतु कुरुगाज युधिष्ठिर अपने सुयशसे उन सबकी कीर्तिको आच्छादित करके विराजमान हो रहे हैं

স্বৰ্গলৈ অহা সকলো ৰাজর্ষি ইয়াত উপস্থিত; তথাপি কুৰুৰাজ যুধিষ্ঠিৰে নিজৰ নিৰ্মল কীৰ্তিৰে তেওঁলোক সকলোৰে কীৰ্তি আৱৰি, শ্ৰেষ্ঠ আসনত অধিষ্ঠিত হৈছে।

Verse 28

लोकानावृत्य यशसा तेजसा वृत्तसम्पदा । स्वशरीरेण सम्प्राप्तं नान्‍्यं शुश्रुम पाण्डवात्‌

বৈশম্পায়নে ক’লে—যশ, তেজ আৰু সদাচাৰ-সম্পদাৰে সকলো লোক আৱৃত কৰি পাণ্ডৱে নিজৰ দেহসহিতেই নিৰ্ধাৰিত অন্ত প্ৰাপ্ত কৰিলে; তেওঁৰ বিষয়ে ইয়াৰ বাহিৰে অন্য কোনো পৰিণাম আমি শুনা নাই।

Verse 29

“अपने यश, तेज और सदाचाररूप सम्पत्तिसे तीनों लोकोंको आवृत करके अपने भौतिक शरीरसे स्वर्गलोकमें आनेका सौभाग्य पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकके सिवा और किसी राजाको प्राप्त हुआ हो, ऐसा हमने कभी नहीं सुना है ।। तेजांसि यानि दृष्टानि भूमिछेन त्वया विभो । वेश्मानि भुवि देवानां पश्यामूनि सहस्रश:

বৈশম্পায়নে ক’লে—পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠিৰৰ বাহিৰে এনে কোনো ৰজাৰ কথা আমি কেতিয়াও শুনা নাই, যিয়ে যশ, তেজ আৰু ধৰ্মাচৰণ-সম্পদে ত্ৰিলোক আৱৃত কৰি নিজৰ ভৌতিক দেহসহিত স্বৰ্গ প্ৰাপ্ত কৰিছে। হে বিভো! পৃথিৱীত থাকোঁতে তুমি যি যি তেজ দেখিছিলা, সেয়াই এতিয়া সহস্ৰশঃ দেৱতাসকলৰ দিৱ্য বাসস্থান—চোৱা।

Verse 30

'प्रभो! युधिष्ठिर! पृथ्वीपर रहते हुए तुमने आकाशमें नक्षत्र और ताराओंके रूपमें जितने तेज देखे हैं, वे इन देवताओंके सहस्रों लोक हैं; इनकी ओर देखो” ।। नारदस्य वच: श्रुत्वा राजा वचनमब्रवीत्‌ | देवानामन्त्रय धर्मात्मा स्वपक्षांश्चैव पार्थिवान्‌,नारदजीकी बात सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने देवताओं तथा अपने पक्षके राजाओंकी अनुमति लेकर कहा--

“প্ৰভু যুধিষ্ঠিৰ! পৃথিৱীত থাকোঁতে আকাশত নক্ষত্ৰ-তাৰাৰূপে তুমি যি যি তেজ দেখিছিলা, সেয়াই এই দেৱতাসকলৰ সহস্ৰ লোক; সেদিকে চোৱা।” নাৰদৰ কথা শুনি ধৰ্মাত্মা ৰজা যুধিষ্ঠিৰে দেৱতাসকল আৰু নিজৰ পক্ষৰ ৰজাসকলৰ অনুমতি লৈ ক’লে।

Verse 31

शुभं वा यदि वा पापं भ्रातृणां स्थानमद्य मे । तदेव प्राप्तुमिच्छामि लोकानन्यान्न कामये

মোৰ ভাতৃসকলৰ গতি শুভ হওক বা পাপময়—আজি মই সেই একে অৱস্থাই প্ৰাপ্ত কৰিবলৈ ইচ্ছা কৰোঁ। তেওঁলোকৰ লোকৰ বাহিৰে অন্য কোনো লোক মই কামনা নকৰোঁ।

Verse 32

'देवेश्वर! मेरे भाइयोंको शुभ या अशुभ जो भी स्थान प्राप्त हुआ हो उसीको मैं भी पाना चाहता हूँ। उसके सिवा दूसरे लोकोंमें जानेकी मेरी इच्छा नहीं है” ।। राज्ञस्तु वचन श्रुत्वा देवराज: पुरंदर: । आनृशंस्यसमायुक्त प्रत्युवाच युधिछ्ठिरम्‌,राजाकी बात सुनकर देवराज इन्द्रने युधिष्ठिससे कोमल वाणीमें कहा--

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—“দেৱেশ্বৰ! মোৰ ভাতৃসকলৰ গতি শুভ হওক বা অশুভ—যি স্থান তেওঁলোকে প্ৰাপ্ত কৰিছে, সেই স্থানেই মইও প্ৰাপ্ত কৰিবলৈ বিচাৰোঁ। তাৰ বাহিৰে অন্য লোকলৈ যোৱাৰ মোৰ কোনো ইচ্ছা নাই।” ৰজাৰ কথা শুনি দেৱৰাজ পুৰন্দৰ ইন্দ্ৰ কৰুণাৰে যুক্ত হৈ যুধিষ্ঠিৰক মৃদু বাক্যে উত্তৰ দিলে।

Verse 33

स्थाने5स्मिन्‌ वस राजेन्द्र कर्मभिर्निर्जिते शुभै: । किं त्वं मानुष्यकं स्नेहमद्यापि परिकर्षसि,“महाराज! तुम अपने शुभ कर्माद्वारा प्राप्त हुए इस स्वर्गलोकमें निवास करो। मनुष्यलोकके स्नेहपाशको क्‍यों अभीतक खींचे ला रहे हो?

বৈশম্পায়নে ক’লে—হে ৰাজেন্দ্ৰ! তোমাৰ শুভ কৰ্মে জয় কৰা এই লোকতে বাস কৰা। তথাপি তুমি এতিয়াও মানৱ-লোকৰ স্নেহ-বন্ধন কিয় আঁকোৱালি ধৰি টানি লৈ ফুৰিছা?

Verse 34

सिद्धि प्राप्तोडसि परमां यथा नान्य: पुमान्‌ क्वचित्‌ | नैव ते भ्रातर: स्थान सम्प्राप्ता: कुरुनन्दन,कुरुनन्दन! तुम्हें वह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है जिसे दूसरा मनुष्य कभी और कहीं नहीं पा सका। तुम्हारे भाई ऐसा स्थान नहीं पा सके हैं

বৈশম্পায়নে ক’লে—হে কুৰুনন্দন! তুমি পৰম সিদ্ধি লাভ কৰিছা—যি আন কোনো মানুহে কেতিয়াও ক’তো লাভ কৰা নাই। কিন্তু তোমাৰ ভ্ৰাতাসকল সেই অৱস্থালৈ নাপালেগৈ।

Verse 35

अद्यापि मानुषो भाव: स्पृशते त्वां नराधिप । स्वर्गोडयं पश्य देवर्षीन्‌ सिद्धांश्व त्रेदिवालयान्‌,“नरेश्वर! क्या अब भी मानवभाव तुम्हारा स्पर्श कर रहा है? राजन! यह स्वर्गलोक है। इन स्वर्गवासी देवर्षियों तथा सिद्धोंका दर्शन करो”

বৈশম্পায়নে ক’লে—হে নৰাধিপ! এতিয়াও মানৱভাব তোমাক স্পৰ্শ কৰিছে নেকি? এইটো স্বৰ্গলোক; ত্ৰিদিবত বাস কৰা দেবর্ষি আৰু সিদ্ধসকলক চোৱা।

Verse 36

युधिष्ठिरस्तु देवेन्द्रमेवंवादिनमी श्वरम्‌ । पुनरेवाब्रवीद्‌ धीमानिदं वचनमर्थवत्‌,ऐसी बात कहते हुए ऐश्वर्यशाली देवराजसे बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिरने पुनः यह अर्थयुक्त वचन कहा--

বৈশম্পায়নে ক’লে—এইদৰে ক’বলৈ ধৰা দেৱেন্দ্ৰ, দেৱসকলৰ অধিপতি, তেওঁক উদ্দেশ কৰি ধীমান যুধিষ্ঠিৰে পুনৰ এবাৰ অৰ্থগম্ভীৰ বাক্য ক’লে।

Verse 37

तैर्विना नोत्सहे वस्तुमिह दैत्यनिबर्हण । गन्तुमिच्छामि तत्राहं यत्र ते भ्रातरो गता:,'दैत्यसूदन! अपने भाइयोंके बिना मुझे यहाँ रहनेका उत्साह नहीं होता; अतः मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कदवाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियोंमें श्रेष्ठ मेरी द्रौपदी गयी है

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে দৈত্যনিবৰহণ! মোৰ ভ্ৰাতাসকলৰ অবিহনে ইয়াত বাস কৰিবলৈ মোৰ উৎসাহ নাই। য’ত মোৰ ভ্ৰাতাসকল গৈছে, মই তাতেই যাব বিচাৰোঁ।

Verse 38

यत्र सा बृहती श्यामा बुद्धिसत्त्वगुणान्विता । द्रौपदी योषितां श्रेष्ठा यत्र चैव गता मम,'दैत्यसूदन! अपने भाइयोंके बिना मुझे यहाँ रहनेका उत्साह नहीं होता; अतः मैं वहीं जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे भाई गये हैं तथा जहाँ ऊँचे कदवाली, श्यामवर्णा, बुद्धिमती सत्त्वगुणसम्पन्ना एवं युवतियोंमें श्रेष्ठ मेरी द्रौपदी गयी है

বৈশম্পায়নে ক’লে—ময়ো সেই একে ঠাইলৈ যাবলৈ ইচ্ছা কৰোঁ, য’ত মোৰ দ্ৰৌপদী গৈছে—উচ্চদেহা, শ্যামবৰ্ণা, বুদ্ধি আৰু সত্ত্বগুণে সমন্বিতা, নাৰীৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠা।

Frequently Asked Questions

Whether Yudhiṣṭhira should accept entry to svarga by abandoning a dependent companion (the dog) and proceeding without his fallen kin, or uphold non-abandonment and loyalty even at the cost of heavenly access.

Dharma is validated as consistency: principled care for dependents and refusal to trade integrity for reward is portrayed as superior to compliance with status-based conventions.

Yes in functional form: Dharma’s praise and Nārada’s proclamation act as meta-commentary, marking Yudhiṣṭhira’s bodily ascent as exceptionally rare and framing the episode as a completed dharma-test with confirmatory outcome.