
Cavana’s Tests of Kuśika and the Queen (अध्याय ५३: च्यवन–कुशिक-परिक्षा)
Upa-parva: Dāna-Dharma and Vrata-Narratives (Cavana–Kuśika Episode)
Yudhiṣṭhira asks what Kuśika did after the sage vanished. Bhīṣma narrates that the king, ashamed and mentally shaken, returns home and finds Cavana resting there. The king and queen, astonished, attend the sage respectfully; Cavana requests oil massage and bathing arrangements, and they comply with costly, refined supplies. Cavana then dismisses these preparations and disappears again without eliciting anger or envy from the couple. Later, Cavana reappears, accepts offerings, and instructs Kuśika to prepare a fully equipped war-chariot; the king and queen are yoked to it and compelled to pull it slowly, while the king orders his attendants to give away wealth and valuables to passersby and Brahmins as requested. Despite wounds, hunger, and prolonged strain, the couple maintains composure. Observers remark on the ascetic’s power and the couple’s endurance. Satisfied, Cavana releases them, heals them by touch, grants a boon, and promises auspicious outcomes; the king returns home rejuvenated and radiant, while the sage establishes an extraordinary, jewel-like hermitage by his will.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर में भीष्म गौओं की महिमा के प्रसंग से एक प्राचीन वृत्तान्त छेड़ते हैं—नहुष और महर्षि च्यवन का संवाद, जिसमें करुणा और धर्म का असाधारण संगम होने वाला है। → महर्षि च्यवन, महान् व्रतधारी और सर्वभूतहितैषी, जलचरों तक को आश्रय देने वाले चन्द्रमा-सम शीतल स्वभाव से नदी-तट पर रहते हैं। उधर निषाद मछलियों के लिए विस्तृत, नव-सूत्रकृत जाल जल में डालते हैं; जलचर परस्पर संहृष्ट होकर उसमें फँसते जाते हैं। → जाल खींचे जाने पर मछलियाँ स्थल-संस्पर्श से त्रस्त होकर व्याकुल होने लगती हैं; उसी जाल के साथ महर्षि च्यवन भी नदी से बाहर आ जाते हैं। मुनि का निर्णायक वचन गूँजता है—वे जल में बसे इन मत्स्यों का साथ छोड़ने को तैयार नहीं: ‘मैं इन मछलियों के साथ ही प्राण-त्याग या प्राण-रक्षा करूँगा; इनके बिना नहीं रहूँगा।’ → मुनि के इस अद्भुत संकल्प से निषाद भय-कम्पित हो उठते हैं, विवर्ण मुख से जाकर राजा नहुष को समस्त घटना निवेदित करते हैं—अब राजधर्म की परीक्षा निकट है। → नहुष तक समाचार पहुँच चुका है; क्या वह मुनि और जलचरों के प्रति करुणा-धर्म निभाएगा, या राज्य-हित/आजीविका के तर्क से निषादों का पक्ष लेगा?
Verse 1
भीकम (2 अमान पज्चाशत्तमो<्ध्याय: गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना युधिछिर उवाच दर्शने कीदृश: स्नेह: संवासे च पितामह । महाभाग्यं गवां चैव तन्मे व्याख्यातुमरहसि,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! किसीको देखने और उसके साथ रहनेपर कैसा स्नेह होता है? तथा गौओंका माहात्म्य क्या है? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ! কেৱল দৰ্শনে কেনে স্নেহ জন্মে, আৰু সহবাসে কেনে স্নেহ বৃদ্ধি পায়? লগতে গৰুসমূহৰ মহাভাগ্য আৰু মাহাত্ম্য কি? অনুগ্ৰহ কৰি সেয়া মোক বিস্তাৰে ব্যাখ্যা কৰক।
Verse 2
भीष्म उवाच हन्त ते कथयिष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते । नहुषस्य च संवादं महर्षेश््यवनस्य च,भीष्मजीने कहा--महातेजस्वी नरेश! इस विषयमें मैं तुमसे महर्षि च्यवन और नहुषके संवादरूप प्राचीन इतिहासका वर्णन करूँगा
ভীষ্মে ক’লে—হে মহাতেজস্বী নৃপ! শুনা; মই তোমাক এটা প্ৰাচীন বৃত্তান্ত ক’ম—ৰাজা নহুষ আৰু মহর্ষি চ্যৱনৰ সংলাপ। এই পুৰাবৃত্তৰ দ্বাৰা ধৰ্মৰ পোহৰত বিষয়টো স্পষ্ট হ’ব।
Verse 3
पुरा महर्षिक्ष्यवनो भार्गवों भरतर्षभ । उदवासकृतारम्भो बभूव स महाव्रत:,भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, भृगुके पुत्र महर्षि च्यवनने महान् व्रतका आश्रय ले जलके भीतर रहना आरम्भ किया
হে ভাৰতশ্ৰেষ্ঠ! প্ৰাচীন কালত ভৃগুবংশীয় মহর্ষি চ্যৱনে মহাব্ৰত গ্ৰহণ কৰি জলে ভিতৰত বাস কৰাৰ তপস্যা আৰম্ভ কৰিছিল।
Verse 4
निहत्य मान क्रोध॑ च प्रहर्ष शोकमेव च । वर्षाणि द्वादश मुनिर्जलवासे धृतव्रत:,वे अभिमान, क्रोध, हर्ष और शोकका परित्याग करके दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए बारह वर्षो-तक जलके भीतर रहे
অহংকাৰ আৰু ক্ৰোধ দমন কৰি, লগতে হৰ্ষ আৰু শোকো ত্যাগ কৰি, দৃঢ়ব্ৰতী সেই মুনিয়ে বাৰ বছৰ জলে ভিতৰত বাস কৰিছিল।
Verse 5
आदधत् सर्वभूतेषु विश्रम्भं॑ परमं शुभम् | जलेचरेषु सर्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभु:,शीतल किरणोंवाले चन्द्रमाके समान उन शक्तिशाली मुनिने सम्पूर्ण प्राणियों, विशेषतः सारे जलचर जीवोंपर अपना परम मंगलकारी पूर्ण विश्वास जमा लिया था
সেই শক্তিমান মুনি শীতল কিৰণৰ চন্দ্ৰমাৰ দৰে আছিল; তেওঁ সকলো প্ৰাণীৰ মাজত, বিশেষকৈ সকলো জলচৰ জীৱৰ মাজত, পৰম মঙ্গলময় বিশ্বাস স্থাপন কৰিছিল।
Verse 6
स्थाणुभूत: शुचिर्भूत्वा दैवते भ्य: प्रणम्य च । गंगायमुनयोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह,एक समय वे देवताओंको प्रणामकर अत्यन्त पवित्र होकर गंगा-यमुनाके संगममें जलके भीतर प्रविष्ट हुए और वहाँ काष्ठकी भाँति स्थिर भावसे बैठ गये
এবাৰ তেওঁ শুচি হৈ দেৱতাসকলক প্ৰণাম কৰি গংগা-যমুনাৰ সংগমত জলে ভিতৰত প্ৰৱেশ কৰিলে আৰু তাত কাঠৰ দৰে নিশ্চল হৈ বহি ৰ’ল।
Verse 7
गंगायमुनयोवेंगं सुभीम॑ं भीमनि:स्वनम् | प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे,गंगा-यमुनाका वेग बड़ा भयंकर था। उससे भीषण गर्जना हो रही थी। वह वेग वायुवेगकी भाँति दुःसह था तो भी वे मुनि अपने मस्तकपर उसका आघात सहने लगे
ভীষ্মে ক’লে—গংগা আৰু যমুনাৰ সোঁত অতি ভয়ংকৰ আছিল; ভীষণ নিনাদে গর্জন কৰিছিল। বায়ুবেগসম তীব্ৰ আৰু দুৰ্বহ সেই ধাৰাকো সেই মুনিয়ে নিজৰ মস্তকত গ্ৰহণ কৰি সহন কৰিলে।
Verse 8
गंगा च यमुना चैव सरितश्न सरांसि च । प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडयन्,परंतु गंगा-यमुना आदि नदियाँ और सरोवर ऋषिकी केवल परिक्रमा करते थे, उन्हें वष्ट नहीं पहुँचाते थे
ভীষ্মে ক’লে—গংগা, যমুনা আৰু অন্যান্য নদী-সৰোবৰসমূহে সেই ঋষিৰ শ্ৰদ্ধাৰে প্ৰদক্ষিণা কৰিছিল; তেওঁক চেপি ধৰা নাছিল, কোনো ক্ষতিও নকৰিছিল।
Verse 9
अन्तर्जलेषु सुष्वाप काष्ठ भूतो महामुनि: । ततश्रोर्ध्वस्थितो धीमानभवद् भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! वे बुद्धिमान् महामुनि कभी पानीमें काठकी भाँति सो जाते और कभी उसके ऊपर खड़े हो जाते थे
ভীষ্মে ক’লে—সেই মহামুনি জলে ভিতৰত কাঠৰ দৰে নিশ্চল হৈ শুই থাকিছিল; তাৰ পিছত, হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ, সেই ধীমানে জলে ওপৰত উঠি থিয় হৈছিল।
Verse 10
जलौकसां स सत्त्वानां बभूव प्रियदर्शन: । उपाजिघ्रन्त च तदा तस्योष्ठ॑ हृष्टमानसा:
ভীষ্মে ক’লে—জলবাসী প্ৰাণীবোৰৰ বাবে তেওঁ অতি প্ৰিয়দৰ্শন আছিল। তেতিয়া সিহঁতে হৃষ্টচিত্তে ওচৰলৈ আহি তেওঁৰ ওঁঠ শুঁঘিবলৈ ধৰিলে।
Verse 11
वे जलचर जीवोंके बड़े प्रिय हो गये थे। जल-जन्तु प्रसन्नचित्त होकर उनका ओठ सूँघा करते थे ।। तत्र तस्यासत: काल: समतीतो5भवन्महान् । ततः कदाचित् समये कसम्मिंश्वचिन्मत्स्यजीविन:
ভীষ্মে ক’লে—তাতেই তেওঁ থাকোঁতে বহুত সময় পাৰ হৈ গ’ল। তাৰ পিছত কোনো এক সময়ত সংযোগবশত কিছুমান মৎস্যজীৱী (মাছমৰা) তাত আহি উপস্থিত হ’ল।
Verse 12
त॑ं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते । निषादा बहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चया:
ভীষ্মে ক’লে— “হে মহাতেজস্বী! হাতে জাল লৈ বহু নিষাদ সেই ঠাইলৈ আহিল; মাছ ধৰি তুলি লৈ যাবলৈ তেওঁলোক দৃঢ় সংকল্প কৰিছিল।”
Verse 13
महातेजस्वी नरेश! इस तरह उन्हें पानीमें रहते बहुत दिन बीत गये। तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले बहुत-से मल्लाह मछली पकड़नेका निश्चय करके जाल हाथमें लिये हुए उस स्थानपर आये ।। व्यायता बलिन: शूरा: सलिलेष्वनिवर्तिन: । अभ्याययुश्च त॑ं देशं निश्चिता जालकर्मणि,वे मल्लाह बड़े परिश्रमी, बलवान, शौर्यसम्पन्न और पानीसे कभी पीछे न हटनेवाले थे। वे जाल बिछानेका दृढ़ निश्चय करके उस स्थानपर आये थे
ভীষ্মে ক’লে— “হে মহাৰাজ! পানীত বাস কৰি কৰি তেওঁলোকৰ বহু দিন পাৰ হৈ গ’ল। তাৰ পাছত এক সময়ত মাছৰ ওপৰত নিৰ্ভৰ কৰি জীৱিকা চলোৱা বহু মাছমৰীয়া হাতে জাল লৈ, মাছ ধৰাৰ দৃঢ় সংকল্প কৰি সেই ঠাইতে আহিল। তেওঁলোক আছিল কঠোৰ পৰিশ্ৰমী, বলৱান, বীৰ, আৰু পানীত নামিবলৈ কেতিয়াও পিছুৱা নহোৱা; জাল-কর্মত অচল মন লৈ তেওঁলোক সেই দেশলৈ আগবাঢ়িল।”
Verse 14
जालं॑ ते योजयामासुर्नि:शेषेण जनाधिप । मत्स्योदक॑ समासाद्य तदा भरतसत्तम,भरतवंशशिरोमणि नरेश! उस समय जहाँ मछलियाँ रहती थीं, उतने गहरे जलमें जाकर उन्होंने अपने जालको पूर्णरूपसे फैला दिया
ভীষ্মে ক’লে— “হে জনাধিপ! তেতিয়া তেওঁলোকে নিজৰ জাল সম্পূৰ্ণকৈ মেলি দিলে। য’ত মাছ থাকে সেই গভীৰ পানীলৈ গৈ—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ—তেওঁলোকে তাক সম্পূৰ্ণ ৰূপে পেলাই দিলে।”
Verse 15
ततस्ते बहुभियोंगै: कैवर्ता मत्स्यकाड्क्षिण: । गंगायमुनयोरवारि जालैरभ्यकिरंस्तत:,मछली प्राप्त करनेकी इच्छावाले केवटोंने बहुत-से उपाय करके गंगा-यमुनाके जलको जालोंसे आच्छादित कर दिया
ভীষ্মে ক’লে— “তাৰ পাছত মাছ পাবলৈ আকাঙ্ক্ষী সেই কৈৱৰ্তসকলে বহু উপায়ে গঙ্গা-যমুনাৰ পানী জালৰে যেন আচ্ছাদিত কৰি পেলালে।”
Verse 16
जाल सुविततं तेषां नवसूत्रकृतं तथा । विस्तारायामसम्पन्नं यत् तत्र सलिले$क्षिपन्
ভীষ্মে ক’লে— “তেওঁলোকে পানীত এক সু-বিস্তৃত জাল পেলালে—নতুন সূতাৰে গাঁথা, প্ৰস্থ আৰু দৈৰ্ঘ্যত সম্পূৰ্ণ।”
Verse 17
ततस्ते सुमहच्चैव बलवच्च सुवर्तितम् । अवतीर्य ततः सर्वे जालं चकृषिरे तदा
তাৰ পিছত তেওঁলোকে সেই অতি বৃহৎ, দৃঢ় আৰু সু-বোনা জালখন নামালে। তাৰ পাছত সকলোৱে নামি সেই সময়তে জাল টানিবলৈ ধৰিলে।
Verse 18
अभीतरूपा: संहृष्टा अन्योन्यवशवर्तिन: । बबन्धुस्तत्र मत्स्यांश्व तथान्यान् जलचारिण:
নিজৰ মনোহৰ ৰূপত মুগ্ধ আৰু উল্লসিত হৈ তেওঁলোকে পৰস্পৰৰ বশত চলি থাকিল। আৰু তাত তেওঁলোকে মাছ আৰু আন জলচৰ প্ৰাণীকো বেঁধি পেলালে।
Verse 19
उनका वह जाल नये सूतका बना हुआ और विशाल था तथा उसकी लंबाई-चौड़ाई भी बहुत थी एवं वह अच्छी तरहसे बनाया हुआ और मजबूत था। उसीको उन्होंने वहाँ जलपर बिछाया था। थोड़ी देर बाद वे सभी मल्लाह निडर होकर पानीमें उतर गये। वे सभी प्रसन्न और एक-दूसरेके अधीन रहनेवाले थे। उन सबने मिलकर जालको खींचना आरम्भ किया। उस जालमें उन्होंने मछलियोंके साथ ही दूसरे जल-जन्तुओंको भी बाँध लिया था ।। १६-- १८ || तथा मत्स्यै: परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम् । आकर्षयन्महाराज जालेनाथ यदृच्छया,महाराज! जाल खींचते समय मल्लाहोंने दैवेच्छासे उस जालके द्वारा मत्स्योंसे घिरे हुए भुगुके पुत्र महर्षि च्यवनको भी खींच लिया
ভীষ্ম ক’লে—মহারাজ! জাল টানোঁতে টানোঁতে দৈৱযোগে, মাছৰ মাজত ঘেৰ খাই থকা ভৃগুনন্দন মহর্ষি চ্যৱনকো তেওঁলোকে সেই জালেই টানি তুলিলে।
Verse 20
नदीशैवलदिग्धाडुं हरिश्मश्रुजटाधरम् । लग्नै: शड्खनखेैगत्रि क्रोडैश्वित्रिरिवार्पितम्,उनका सारा शरीर नदीके सेवारसे लिपटा हुआ था। उनकी मूँछ-दाढ़ी और जटाएँ हरे रंगकी हो गयी थीं और उनके अंगोंमें शंख आदि जलचरोंके नख लगनेसे चित्र बन गया था। ऐसा जान पड़ता था मानो उनके अंगोंमें शूकरके विचित्र रोम लग गये हों
ভীষ্ম ক’লে—তেওঁৰ সমগ্ৰ দেহ নদীৰ শৈৱাল-চিকণ লেপে ঢাকি আছিল। গোঁফ, দাড়ি আৰু জটা সেউজীয়া হৈ পৰিছিল; আৰু শঙ্খ আদি জলচৰ প্ৰাণীৰ নখৰ আঁচৰত তেওঁৰ অঙ্গত বিচিত্ৰ ৰেখা-চিহ্ন পৰিছিল—যেন শূকৰৰ অদ্ভুত ৰোমে অলংকৃত।
Verse 21
तं जालेनोद्धृतं दृष्टवा ते तदा वेदपारगम् । सर्वे प्राजजलयो दाशा: शिरोभि: प्रापतन् भुवि,वेदोंके पारंगत उन विद्वान महर्षिको जालके साथ खिंचा देख सभी मल्लाह हाथ जोड़ मस्तक झुका पृथ्वीपर पड़ गये
ভীষ্ম ক’লে—জালৰ সৈতে ওপৰলৈ টানি তোলা বেদপাৰঙ্গত মহর্ষিক দেখি, সকলো দাশ (মাছমৰা) অঞ্জলি বঁধি, মূৰ নোৱাই, ভূমিত লুটাই পৰিল।
Verse 22
परिखेदपरित्रासाज्जालस्यथाकर्षणेन च । मत्स्या बभूवुर्व्यापन्ना: स्थलसंस्पर्शनेन च,उधर जालके आकर्षणसे अत्यन्त खेद, त्रास और स्थलका संस्पर्श होनेके कारण बहुत-से मत्स्य मर गये। मुनिने जब मत्स्योंका यह संहार देखा, तब उन्हें बड़ी दया आयी और वे बारंबार लंबी साँस खींचने लगे
ভীষ্মে ক’লে—জালৰ ফলত হোৱা তীব্ৰ ক্লান্তি আৰু আতংক, জাল টানি তোলাৰ কষ্ট, আৰু শুকান মাটিৰ স্পৰ্শৰ কাৰণে বহু মাছ মৰিল। মাছৰ এই সংহাৰ দেখি মুনি কৰুণাত আচ্ছন্ন হৈ পুনঃ পুনঃ দীঘল নিশ্বাস এৰিলে।
Verse 23
स मुनिस्तत् तदा दृष्टवा मत्स्यानां कदनं कृतम् । बभूव कृपयाविष्टो नि:श्वसंश्व॒ पुन: पुन:,उधर जालके आकर्षणसे अत्यन्त खेद, त्रास और स्थलका संस्पर्श होनेके कारण बहुत-से मत्स्य मर गये। मुनिने जब मत्स्योंका यह संहार देखा, तब उन्हें बड़ी दया आयी और वे बारंबार लंबी साँस खींचने लगे
মুনিয়ে তেতিয়া মাছবোৰৰ নিধন হোৱা দেখি কৰুণাত আচ্ছন্ন হৈ পুনঃ পুনঃ গভীৰ নিশ্বাস এৰিলে।
Verse 24
निषादा ऊचु. अज्ञानाद् यत् कृतं पापं प्रसाद तत्र नः कुरु । करवाम प्रियं कि ते तन्नो ब्रूहि महामुने,यह देख निषाद बोले--महामुने! हमने अनजानमें जो पाप किया है, उसके लिये हमें क्षमा कर दें और हमपर प्रसन्न हों। साथ ही यह भी बतावें कि हमलोग आपका कौन-सा प्रिय कार्य करें?
নিষাদসকলে ক’লে—হে মহামুনে! অজ্ঞানবশত আমি যি পাপ কৰিলোঁ, তাত আমাক ক্ষমা কৰি প্ৰসন্ন হওক। আৰু কওক, আমি আপোনাৰ কোন প্ৰিয় কাৰ্য কৰোঁ?
Verse 25
इत्युक्तो मत्स्यमध्यस्थश्ष्यवनोवाक्यमत्रवीत् । यो मेडद्य परम: कामस्तं शृणुध्वं समाहिता:,मल्लाहोंके ऐसा कहनेपर मछलियोंके बीचमें बैठे हुए महर्षि च्यवनने कहा --“मल्लाहो! इस समय जो मेरी सबसे बड़ी इच्छा है, उसे ध्यान देकर सुनो
তেওঁলোকে এনেকৈ ক’লে, মাছৰ মাজত বহি থকা মহর্ষি চ্যৱনে ক’লে—“হে মাছমৰা সকল! এই মুহূর্তত মোৰ সৰ্বোচ্চ ইচ্ছা কি, একাগ্ৰচিত্তে শুনা।”
Verse 26
प्राणोत्सर्ग विसर्ग वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह । संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलेडध्युषितानहम्,“मैं इन मछलियोंके साथ ही अपने प्राणोंका त्याग या रक्षण करूँगा। ये मेरे सहवासी रहे हैं। मैं बहुत दिनोंतक इनके साथ जलमें रह चुका हूँ; अतः मैं इन्हें त्याग नहीं सकता”
“প্ৰাণত্যাগ হওক বা প্ৰাণৰক্ষা—মই এই মাছবোৰৰ সৈতে একেলগে তাক গ্ৰহণ কৰিম। ইহঁত মোৰ সহবাসী; বহুদিন মই ইহঁতৰ সৈতে জলে বাস কৰিছোঁ। সেয়ে ইহঁতক ত্যাগ কৰিবলৈ মোৰ মন নাযায়।”
Verse 27
जालके साथ नदीमेंसे निकाले गये महर्षि च्यवन इत्युक्तास्ते निषादास्तु सुभुशं॑ भयकम्पिता: । सर्वे विवर्णवदना नहुषाय न्यवेदयन्,मुनिकी यह बात सुनकर निषादोंको बड़ा भय हुआ। वे थर-थर काँपने लगे। उन सबके मुखका रंग फीका पड़ गया और उसी अवस्थामें राजा नहुषके पास जाकर उन्होंने यह सारा समाचार निवेदन किया
ভীষ্মে ক’লে—জালৰ সৈতে নদীৰ পৰা যাক টানি উলিয়াই আনিছিল, তেওঁ মহর্ষি চ্যৱন বুলি নিষাদসকলে শুনিমাত্ৰেই তীব্ৰ ভয়ত কঁপিবলৈ ধৰিলে। সকলোৰে মুখ ফেকা পৰিল; সিহঁতে তৎক্ষণাৎ ৰজা নহুষৰ ওচৰলৈ গৈ সমগ্ৰ বৃত্তান্ত নিবেদন কৰিলে।
Verse 50
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने पज्चाशत्तमोडथध्याय:
ইতি শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত চ্যৱনোপাখ্যানৰ পঞ্চাশত্তম অধ্যায় সমাপ্ত।
Whether royal duty and ethical composure can be sustained when an authority figure imposes humiliating, costly, and physically punishing demands—testing the boundary between service and resentment.
Dharma is validated by inner steadiness: the chapter presents non-anger, non-envy, and disciplined giving as practices that convert trial into purification and social credibility, rather than as mere ideals.
A direct phalaśruti formula is not foregrounded; instead, the narrative itself supplies the result: restoration of youth and health, receipt of a boon, and the assurance of desired outcomes—framing ethical endurance as causally efficacious within the epic’s moral logic.