
अहिंसयित्वा ब्रह्महत्याविधानम् / Brahmahatyā incurred without physical violence
Upa-parva: Brahmahatyā-anuśāsana (Discourse on ‘Brahmin-slaying’ by non-violent means)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to explain, in principled terms, how brahmahatyā can occur ‘without harming’ (ahiṃsayitvā). Bhīṣma replies that he previously posed the same question to Vyāsa and now transmits Vyāsa’s definitive categories. The chapter enumerates non-violent acts that are treated as brahmahatyā because they effectively destroy a Brahmin’s survival, dignity, or the continuity of sacred knowledge: (1) inviting a poor Brahmin for alms and then refusing by saying ‘there is none’; (2) depriving an uninvolved/neutral learned Brahmin of his means of livelihood; (3) creating obstacles to water access for a thirsty cattle-community; (4) disparaging śruti or authoritative śāstra without understanding; (5) withholding a well-suited marriage for one’s accomplished daughter; (6) causing deep, penetrating grief to twice-born persons through falsehood and adharmic conduct; (7) seizing the entire property of a blind, lame, or incapacitated Brahmin; and (8) abandoning the sacred fire through negligence in āśrama, forest, village, or city. The discourse reframes ‘killing’ as structural harm: deprivation, obstruction, and corrosive speech that dismantle dharmic infrastructure.
Chapter Arc: शरशय्या पर पड़े पितामह के पास युधिष्ठिर का प्रश्न उठता है—प्राचीन ब्राह्मण किसे दान का श्रेष्ठ पात्र मानते हैं: दण्ड-कमण्डलु धारण करने वाला ब्रह्मचारी, या वह जो जीवन-रक्षा हेतु वर्णाश्रमोचित वृत्ति अपनाए? → भीष्म पात्रता को बाह्य चिह्नों से नहीं, आचरण-धर्म से जोड़ते हैं; युधिष्ठिर फिर शंका करते हैं—यदि दाता की श्रद्धा शुद्ध हो तो क्या हव्य-कव्य-दान में दोष रह जाता है? इस पर चर्चा ‘श्रद्धा बनाम पात्रता’ के सूक्ष्म द्वंद्व में प्रवेश करती है। → कश्यप-वचन और भीष्म-निर्णय से शिखर आता है—वेद, षडङ्ग, सांख्य, पुराण, कुल-गौरव—ये सब शील-रहित द्विज को गति नहीं देते; और धर्म-लक्षण के रूप में अहिंसा, सत्य, अक्रोध, आनृशंस्य, दम, आर्जव तथा ब्रह्मचर्य, मद्य-मांस-त्याग, शम आदि को निर्णायक बताया जाता है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि जिन ब्राह्मणों में ये गुण हों, उन्हें दिया दान महान फल देता है; ऐसे पात्र को गाय, घोड़ा, अन्न, धन आदि देने से दाता परलोक में शोक नहीं करता, और एक भी उत्तम द्विज कुल का उद्धार कर सकता है—अतः गुणोपेत ब्राह्मण को दूर से भी खोजकर सत्कारपूर्वक दान देना चाहिए।
Verse 1
युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ! प्राचीन ब्राह्मण किसको दानका श्रेष्ठ पात्र बताते हैं? दण्ड-कमण्डलु आदि चिह्न धारण करनेवाले ब्रह्मचारी ब्राह्मणको अथवा चिह्नरहित गृहस्थ ब्राह्मगको?,सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित गुणवान् ब्राह्मण यदि कहीं दूर भी सुनायी पड़े तो उसको वहाँसे अपने यहाँ बुलाकर उसका हर प्रकारसे पूजन और सत्कार करना चाहिये ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि बहुप्राश्निके द्वाविंशो5ध्याय: ।। २२ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बहुत-से प्रश्नोंका निर्णयविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४६ श्लोक मिलाकर कुल ८७ श्लोक हैं) - श्राद्धमें भोजन करने योग्य ब्राह्मणोंके विषयमें स्मृतियोंमें इस प्रकार उल्लेख मिलता है--कर्मनिष्ठास्तपोनिष्ठा: पजञ्चान्निब्रह्मचारिण: । पितृमातृपराश्रैव ब्राह्मणा: श्राद्धसम्पद: ।। तथा--'व्रतस्थमपि दौत्ित्र श्राद्धे यत्नेन भोजयेत् ।' तात्पर्य यह है कि क्रियानिष्ठ, तपस्वी, पञ्चाग्निका सेवन करनेवाले, ब्रह्मचारी तथा पिता-माताके भक्त--े पाँच प्रकारके ब्राह्मण श्राद्धकी सम्पत्ति हैं। इन्हें भोजन करानेसे श्राद्धकर्मका पूर्णतया सम्पादन होता है।” तथा “अपनी कन्याका बेटा ब्रह्मचारी हो तो भी यत्नपूर्वक उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये।” ऐसा करनेसे श्राद्धकर्ता पुण्यका भागी होता है। केवल श्राद्धमें ही ऐसी छूट दी गयी है। श्राद्धके अतिरिक्त और किसी कर्ममें ब्रह्मचारीको लोभ आदि दिखाकर जो उसके व्रतको भंग करता है, उसे दोषका भागी होना पड़ता है और अपने किये हुए दानका भी पूरा-पूरा फल नहीं मिलता। इसीलिये शास्त्रमें लिखा है कि “मनसा पात्रमुद्दिश्य जलमध्ये जल क्षिपेत् । दाता तत्फलमाप्रोति प्रतिग्राही न दोषभाक् ॥। * अर्थात् “यदि किसी सुपात्र (ब्रह्मचारी आदि)-को दान देना हो तो उसका मनमें ध्यान करे और उसे दान देनेके उद्देश्यसे हाथमें संकल्पका जल लेकर उसे जलहीमें छोड़ दे। इससे दाताको दानका फल मिल जाता है और दान लेनेवालेको दोषका भागी नहीं होना पड़ता।” यह बात सत्पात्रका आदर करनेके लिये बतायी गयी है। (नीलकण्ठी) त्रयोविशो<् ध्याय: देवता और पिततरोंके कार्यमें निमन्त्रण देने योग्य पात्रों तथा नरकगामी और स्वर्गगामी मनुष्योंके लक्षणोंका वर्णन युधिछिर उवाच श्राद्धकाले च दैवे च पित्रयेषपि च पितामह । इच्छामीह त्वया55ख्यातं विहित॑ यत् सुरषिभि:
যুধিষ্ঠিৰে সুধিলে— হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! প্ৰাচীন ব্রাহ্মণসকলে দানৰ শ্ৰেষ্ঠ পাত্ৰ কাক কয়—দণ্ড-কমণ্ডলু আদি তপস্যাৰ চিহ্ন ধাৰণ কৰা ব্রহ্মচাৰী ব্রাহ্মণক, নে বাহ্যচিহ্নবিহীন গৃহস্থ ব্রাহ্মণক? আৰু সদ্জনসকলে সন্মান কৰা গুণৱান ব্রাহ্মণৰ কথা যদি দূৰতো শুনা যায়, তেন্তে তাক তাতেই পৰা নিমন্ত্ৰণ কৰি নিজৰ গৃহত সকলো প্ৰকাৰে পূজা-সতকাৰ কৰা উচিত।
Verse 2
भीष्म उवाच स्ववृत्तिमभिपन्नाय लिज़्िने चेतराय च । देयमाहुर्महाराज उभावेतौ तपस्विनौ,भीष्मजीने कहा--महाराज! जीवन-रक्षाके लिये अपनी वर्णाश्रमोचित वृत्तिका आश्रय लेनेवाले चिह्नधारी या चिह्लरहित किसी भी ब्राह्मणको दान दिया जाना उचित बताया गया है; क्योंकि स्वधर्मका आश्रय लेनेवाले ये दोनों ही तपस्वी एवं दानपात्र हैं
ভীষ্মে ক’লে— মহাৰাজ! জীৱন ৰক্ষাৰ বাবে নিজৰ বৰ্ণাশ্ৰমোচিত জীৱিকা গ্ৰহণ কৰা ব্রাহ্মণ—সেয়া চিহ্নধাৰী হওক বা চিহ্নহীন—উভয়কেই দান দিব লাগে বুলি কোৱা হৈছে; কিয়নো স্বধৰ্মত স্থিত এই দুয়ো তপস্বী আৰু দানপাত্ৰ।
Verse 3
युधिछिर उवाच श्रद्धया परया पूतो यः प्रयच्छेद् द्विजातये । हव्यं कव्यं तथा दानं को दोष: स्यात् पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो केवल उत्कृष्ट श्रद्धासे ही पवित्र होकर ब्राह्मणको हव्य-कव्य तथा अन्य वस्तुका दान देता है, उसे अन्य प्रकारकी पवित्रता न होनेके कारण किस दोषकी प्राप्ति होती है?
যুধিষ্ঠিৰে সুধিলে— পিতামহ! যি ব্যক্তি কেৱল পৰম শ্ৰদ্ধাৰে শুদ্ধ হৈ দ্বিজ (ব্রাহ্মণ)ক হব্য, কব্য আৰু অন্য দান দিয়ে, তেন্তে অন্য ধৰণৰ শৌচ-শুদ্ধি নথকাৰ বাবে তাৰ কি দোষ হয়?
Verse 4
भीष्म उवाच श्रद्धापूतो नरस्तात दुर्दान्तोी5पि न संशय: । पूतो भवति सर्वत्र किमुत त्वं महाद्युते,भीष्मजीने कहा--तात! मनुष्य जितेन्द्रिय न होनेपर भी केवल श्रद्धामात्रसे पवित्र हो जाता है--इसमें संशय नहीं है। महातेजस्वी नरेश! श्रद्धापूत मनुष्य सर्वत्र पवित्र होता है, फिर तुम-जैसे धर्मात्माके पवित्र होनेमें तो संदेह ही क्या है?
ভীষ্মে ক’লে—বৎস! দমন কৰাটো কঠিন মানুহো কেৱল শ্ৰদ্ধাৰ দ্বাৰাই পবিত্ৰ হয়—ইয়াত সন্দেহ নাই। শ্ৰদ্ধাৰে শুদ্ধ হোৱা পুৰুষ সৰ্বত্ৰ শুদ্ধ; সেয়ে, হে মহাতেজস্বী, ধৰ্মানুগ স্বভাৱধাৰী তোমাৰ পবিত্ৰতাত সন্দেহ ক’ত?
Verse 5
युधिछिर उवाच न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवेषु सततं नर: । कव्यप्रदाने तु बुधा: परीक्ष्यं ब्राह्मणं विदु:,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! विद्वानोंका कहना है कि देवकार्यमें कभी ब्राह्मणकी परीक्षा न करे, किंतु श्राद्धमें अवश्य उसकी परीक्षा करे; इसका क्या कारण है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—পিতামহ! পণ্ডিতসকলে কয় যে দেৱকাৰ্যত মানুহে কেতিয়াও ব্ৰাহ্মণক পৰীক্ষা নকৰিব; কিন্তু শ্ৰাদ্ধত কব্য-প্ৰদানৰ সময়ত ব্ৰাহ্মণক পৰীক্ষা কৰা উচিত বুলি বুদ্ধিমানসকলে মানে—ইয়াৰ কাৰণ কি?
Verse 6
भीष्म उवाच न ब्राह्मण: साधयते हव्यं दैवात् प्रसिद्ध्यति । देवप्रसादादिज्यन्ते यजमानैर्न संशय:,भीष्मजीने कहा--बेटा! यज्ञ-होम आदि देवकार्यकी सिद्धि ब्राह्मणके अधीन नहीं है, वह दैवसे सिद्ध होता है। देवताओंकी कृपासे ही यजमान यज्ञ करते हैं। इसमें संशय नहीं है
ভীষ্মে ক’লে—বৎস! যজ্ঞ-হোম আদি দেৱকাৰ্যৰ সিদ্ধি ব্ৰাহ্মণৰ অধীন নহয়; সেয়া দেৱবিধিৰ বলতেই সিদ্ধ হয়। দেৱতাৰ প্ৰসাদে যজমানসকলে যজ্ঞ কৰে—ইয়াত সন্দেহ নাই।
Verse 7
ब्राह्मणान् भरतश्रेष्ठ सततं ब्रह्म॒ुवादिन: । मार्कण्डेय: पुरा प्राह इति लोकेषु बुद्धिमान् ७ ।। भरतमश्रेष्ठ! बुद्धिमान मार्कण्डेयजीने बहुत पहलेसे ही यह बता रखा है कि श्राद्धमें सदा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको ही निमन्त्रित करना चाहिये (क्योंकि उसकी सिद्धि सुपात्र ब्राह्मणके ही अधीन है)
ভীষ্মে ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! শ্ৰাদ্ধত সদায় ব্ৰহ্মবাদী, বেদজ্ঞ ব্ৰাহ্মণসকলকেই নিমন্ত্ৰণ কৰা উচিত। জ্ঞানী মাৰ্কণ্ডেয়ে পুৰাতন কালতে এই কথা কৈ গৈছে, আৰু লোকসমাজত ই স্বীকৃত।
Verse 8
युधिछिर उवाच अपूर्वोजप्यथवा विद्वान् सम्बन्धी वा यथा भवेत् । तपस्वी यज्ञशीलो वा कथं पात्र भवेत् तु सः,युधिष्ठिरने पूछा--जो अपरिचित, विद्वान, सम्बन्धी, तपस्वी अथवा यज्ञशील हों, इनमेंसे कौन किस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न होनेपर श्राद्ध एवं दानका उत्तम पात्र हो सकता है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—যি আগতে অপৰিচিত, অথবা বিদ্বান, বা পৰিস্থিতি অনুসাৰে আত্মীয়; তপস্বী হওক বা যজ্ঞনিষ্ঠ হওক—এনে ব্যক্তি কোন কোন গুণে যুক্ত হলে শ্ৰাদ্ধ আৰু দানৰ উত্তম পাত্ৰ হয়?
Verse 9
भीष्म उवाच कुलीन: कर्मकृद् वैद्यस्तथैवाप्यानृशंस्यवान् | ह्वीमानृजु: सत्यवादी पात्र पूर्वे च ये त्रय:,भीष्मजीने कहा--कुलीन, कर्मठ, वेदोंके विद्वान, दयालु, सलज्ज, सरल और सत्यवादी--इन सात प्रकारके गुणवाले जो पूर्वोक्त तीन (अपरिचित विद्वान, सम्बन्धी और तपस्वी) ब्राह्मण हैं, वे उत्तम पात्र माने गये हैं
ভীষ্মে ক’লে—যি সুকুলজাত, ধৰ্মকৰ্মত পৰিশ্ৰমী, বেদবিদ্ আৰু দয়ালু; লগতে লজ্জাশীল, সৰল আৰু সত্যবাদী—সেইজন দানৰ উত্তম পাত্ৰ। আৰু আগতে কোৱা সেই তিন প্ৰকাৰ—অপৰিচিত বিদ্বান ব্ৰাহ্মণ, আত্মীয় আৰু তপস্বী—তেওঁলোকো শ্ৰেষ্ঠ পাত্ৰ বুলি গণ্য।
Verse 10
तत्रेमं शृणु मे पार्थ चतुर्णा तेजसां मतम् | पृथिव्या: काश्यपस्याग्नेर्मार्कण्डेयस्य चैव हि,कुन्तीनन्दन! इस विषयमें तुम मुझसे पृथ्वी, काश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय--इन चार तेजस्वी व्यक्तियोंका मत सुनो
কুন্তীনন্দন পাৰ্থ! এতিয়া এই বিষয়ত মোৰ পৰা চাৰিজন তেজস্বী মহাত্মাৰ মত শুনা—পৃথিৱী, কাশ্যপ, অগ্নি আৰু মহর্ষি মার্কণ্ডেয়। ধৰ্ম আৰু অভিজ্ঞতাৰ আধাৰত তেওঁলোকৰ সাক্ষ্যই এই কথা স্পষ্ট কৰিব।
Verse 11
पृथिव्युवाच यथा महाणेवि क्षिप्त: क्षिप्रं लेष्टविनश्यति । तथा दुश्नरितं सर्व त्रिवृत्यां च निमज्जति,पृथ्वी कहती है--जिस प्रकार महासागरमें फेंका हुआ ढेला तुरंत गलकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार याजन, अध्यापन और प्रतिग्रह--इन तीन वृत्तियोंसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मणमें सारे दुष्कर्मोका लय हो जाता है
পৃথিৱীয়ে ক’লে—যেনেকৈ মহাসাগৰত নিক্ষিপ্ত মাটিৰ ঢেলা অতি সোনকালে গলি লীন হৈ যায়, তেনেকৈ যাজন, অধ্যাপন আৰু প্ৰতিগ্ৰহ—এই ত্ৰিবৃত্তিৰে জীৱিকা চলোৱা ব্ৰাহ্মণত সকলো দুষ্কৰ্ম ডুবি লয় হয়।
Verse 12
काश्यप उवाच सर्वे च वेदा: सह षड्भिरज्जैः सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म । नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य,काश्यप कहते हैं--नरेश्वर! जो ब्राह्मण शीलसे रहित हैं, उसे छहों अंगोंसहित वेद, सांख्य और पुराणका ज्ञान तथा उत्तम कुलमें जन्म--ये सब मिलकर भी उत्तम गति नहीं प्रदान कर सकते
কাশ্যপে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! যি ব্ৰাহ্মণ শীলহীন, তাৰ বাবে ষড়ঙ্গসহ সকলো বেদ, সাংখ্য আৰু পুৰাণৰ জ্ঞান, আৰু উত্তম কুলত জন্ম—এই সকলো একেলগে থাকিলেও উচ্চ গতি লাভৰ উপায় নহয়।
Verse 13
अग्निर॒ुवाच अधीयान: पण्डितं मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यश: परेषाम् | प्रभ्रश्यतेडसौ चरते न सत्यं लोकास्तस्य हारान्तवन्तो भवन्ति,अग्नि कहते हैं--जो ब्राह्मण अध्ययन करके अपनेको बहुत बड़ा पण्डित मानता और अपनी दिद्वत्तापर गर्व करने लगता है तथा जो अपनी विद्याके बलसे दूसरोंके यशका नाश करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट होकर सत्यका पालन नहीं करता; अतः उसे नाशवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है
অগ্নিয়ে ক’লে—যি অধ্যয়ন কৰি নিজকে মহাপণ্ডিত বুলি মানি বিদ্যাৰ গৰ্বত মত্ত হয়, আৰু সেই বিদ্যাৰ বলেই আনৰ যশ নষ্ট কৰে—সেয়া ধৰ্মৰ পৰা পতিত হয়, সত্যপথে নচলে; সেয়ে সি ক্ষয়শীল লোক লাভ কৰে, যাৰ অন্ত পৰাজয়ত।
Verse 14
मार्कण्डेय उवाच अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । नाभिजानामि यद्यस्य सत्यस्यार्धमवाप्तरुयात्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--यदि तराजूके एक पलड़ेमें एक हजार अश्वमेध-यज्ञको और दूसरेमें सत्यको रखकर तौला जाय तो भी न जाने वे सारे अश्वमेध-यज्ञ इस सत्यके आधेके बराबर भी होंगे या नहीं?
মাৰ্কণ্ডেয় ক’লে—যদি তুলাৰ এটা পাল্লাত সহস্ৰ অশ্বমেধ যজ্ঞ আৰু আনটো পাল্লাত সত্য ৰাখি তোলা হয়, তথাপি মই ক’ব নোৱাৰোঁ যে সেই সকলো যজ্ঞ সত্যৰ আধাৰো সমান হ’ব নে নহ’ব। সত্যৰ মূল্য অপৰিমেয়।
Verse 15
भीष्म उवाच इत्युक्त्वा ते जग्मुराशु चत्वारोडमिततेजस: । पृथिवी काश्यपो<ग्निश्च प्रकृष्टायुश्व भार्गव:,भीष्मजी कहते हैं-युधिष्ठि!! इस प्रकार अपना मत प्रकट करके वे चारों अमिततेजस्वी व्यक्ति--पृथ्वी, काश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय शीघ्र ही चले गये
ভীষ্ম ক’লে—যুধিষ্ঠিৰ! এইদৰে নিজৰ মত প্ৰকাশ কৰি সেই চাৰিজন অপৰিমেয় তেজস্বী—পৃথিৱী, কাশ্যপ, অগ্নি আৰু দীৰ্ঘায়ু ভাৰ্গৱ (মাৰ্কণ্ডেয়)—তৎক্ষণাৎ প্ৰস্থান কৰিলে।
Verse 16
युधिषछ्िर उवाच यदि ते ब्राह्मणा लोके व्रतिनो भुञ्जते हवि: । दत्तं ब्राह्गकामाय कथं तत् सुकृतं भवेत्,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! यदि ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें हविष्यान्नका भोजन करते हैं तो श्रेष्ठ ब्राह्यणकी कामनासे उन्हें दिया हुआ दान कैसे सफल हो सकता है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—পিতামহ! যদি এই লোকত ব্ৰতধাৰী ব্ৰাহ্মণসকলে শ্ৰাদ্ধত হৱিষ্যান্ন ভোজন কৰে, তেন্তে ‘ব্ৰাহ্ম’ (শ্ৰেষ্ঠ) ফলৰ কামনাৰে দিয়া দান কেনেকৈ সঁচাকৈ সুকৃত (পুণ্য) হ’ব পাৰে?
Verse 17
भीष्म उवाच आदिष्टिनो ये राजेन्द्र ब्राह्मणा वेदपारगा: । भुज्जते ब्रह्म॒कामाय व्रतलुप्ता भवन्ति ते,भीष्मजीने कहा--राजेन्द्र! (जिन्हें गुरुने नियत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेका आदेश दे रखा है वे आदिष्टी कहलाते हैं।) ऐसे वेदके पारड़त आदिष्टी ब्राह्मण यदि यजमानकी ब्राह्मणको दान देनेकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन करते हैं तो उनका अपना ही व्रत नष्ट हो जाता है (इससे दाताका दान दूषित नहीं होता है)-
ভীষ্ম ক’লে—ৰাজেন্দ্ৰ! গুৰুৰ আদেশমতে নিৰ্দিষ্ট কাললৈ ব্ৰহ্মচৰ্য-ব্ৰতত বদ্ধ, বেদপাৰঙ্গত ‘আদিষ্টি’ ব্ৰাহ্মণসকলে যদি যজমানৰ ব্ৰাহ্মণক দান দিবৰ ইচ্ছা পূৰণ কৰিবলৈ শ্ৰাদ্ধত ভোজন কৰে, তেন্তে তেওঁলোকৰ নিজৰ ব্ৰত ক্ষুণ্ণ হয়; দোষ ভোজকৰ, দাতাৰ দানৰ নহয়।
Verse 18
युधिछिर उवाच अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिण: । किंनिमित्तं भवेदत्र तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! विद्वानोंका कहना है कि धर्मके साधन और फल अनेक प्रकारके हैं। पात्रके कौन-से गुण उसकी दानपात्रतामें कारण होते हैं? यह मुझे बताइये
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—পিতামহ! মনীষীসকলে কয় যে ধৰ্ম বহু-পাক্ষিক আৰু বহু দুৱাৰেৰে লাভ্য। এই বিষয়ত নিৰ্ণায়ক কাৰণ কি? সেয়া মোক কওক।
Verse 19
भीष्म उवाच अहिंसा सत्यमक्रोध आनृशंस्यं दमस्तथा । आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम्,भीष्मजीने कहा--राजेन्द्र! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कोमलता, इन्द्रियसंयम और सरलता--ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं
ভীষ্মে ক’লে—ৰাজেন্দ্ৰ! অহিংসা, সত্য, অক্ৰোধ, কৰুণা, ইন্দ্ৰিয়-সংযম আৰু সৰলতা—এইবোৰেই ধৰ্মৰ নিশ্চিত লক্ষণ।
Verse 20
ये तु धर्म प्रशंसन्तश्नरन्ति पृथिवीमिमाम् | अनाचरन्तस्तद् धर्म संकरेडभिरता: प्रभो,प्रभो! जो लोग इस पृथ्वीपर धर्मकी प्रशंसा करते हुए घूमते-फिरते हैं; परंतु स्वयं उस धर्मका आचरण नहीं करते, वे ढोंगी हैं और धर्मसंकरता फैलानेमें लगे हैं
ভীষ্মে ক’লে—প্ৰভো! যিসকলে এই পৃথিৱীত ধৰ্মৰ প্ৰশংসা কৰি ফুৰে, কিন্তু নিজে সেই ধৰ্ম আচৰণ নকৰে—সিহঁত ভণ্ড; ধৰ্মৰ নামত বিভ্ৰান্তি আৰু কলুষতা বঢ়োৱাতেই ৰত থাকে।
Verse 21
तेभ्यो हिरण्यं रत्नं वा गामश्चं वा ददाति यः । दश वर्षाणि विष्ठां स भुड्क्ते निरयमास्थित:,ऐसे लोगोंको जो सुवर्ण, रत्न, गौ अथवा अश्व आदि वस्तुओंका दान करता है वह नरकमें पड़कर दस वर्षोंतक विष्ठा खाता है
ভীষ্মে ক’লে—যি জনে তেনে লোকক সোন, ৰত্ন, গাই, ঘোঁৰা আদি মূল্যবান বস্তু দান কৰে, সি নৰকত পতিত হৈ দহ বছৰ বিষ্ঠা ভক্ষণ কৰিবলগীয়া হয়।
Verse 22
मेदानां पुल्कसानां च तथैवान्तेवसायिनाम् । कृतं कर्माकृतं वापि रागमोहेन जल्पताम्,जो उच्चवर्णके लोग राग और मोहके वशीभूत हो अपने किये अथवा बिना किये शुभ कर्मका जनसमुदायमें वर्णन करते हैं वे मेद, पुल्कस तथा अन्त्यजोंके तुल्य माने जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—ৰাগ-মোহৰ বশত পৰি, নিজে কৰা বা নকৰা পুণ্যকৰ্মৰ কথা জনসমাজত ঢাক পিটা উচ্চবৰ্ণীয় লোকসকল মেদ, পুল্কস আৰু অন্ত্যজসকলৰ সমতুল্য গণ্য হয়।
Verse 23
वैश्वदेवं च ये मूढा विप्राय ब्रह्मचारिणे । ददते नेह राजेन्द्र ते लोकान् भुज्जतेडशुभान्,राजेन्द्र! जो मूढ़ मानव ब्रह्मचारी ब्राह्मणको बलि-वैश्वदेवसम्बन्धी अन्न (अतिथियोंको देनेयोग्य हन्तकार) नहीं देते हैं, वे अशुभ लोकोंका उपभोग करते हैं
ভীষ্মে ক’লে—ৰাজেন্দ্ৰ! যিসকল মূঢ় মানুহে এই লোকত ব্ৰহ্মচাৰী ব্ৰাহ্মণক বৈশ্বদেৱ-সম্পৰ্কীয় অন্ন দান নকৰে, সিহঁতে অশুভ লোকসমূহ ভোগ কৰে।
Verse 24
युधिछिर उवाच कि परं ब्रह्मचर्य च कि परं धर्मलक्षणम् | किं च श्रेष्ठतमं शौचं तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! उत्तम ब्रह्मचर्य क्या है? धर्मका सबसे श्रेष्ठ लक्षण क्या है? तथा सर्वोत्तम पवित्रता किसे कहते हैं? यह मुझे बताइये
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ, পৰম ব্ৰহ্মচৰ্য কি? ধৰ্ম চিনাৰ সৰ্বোচ্চ লক্ষণ কি? আৰু শ্ৰেষ্ঠতম শৌচ (পবিত্ৰতা) কোনটো? মোক কওক।
Verse 25
भीष्म उवाच ब्रह्मचर्यात् परं तात मधुमांसस्य वर्जनम् | मयदियां स्थितो धर्म: शमश्वैवास्य लक्षणम्,भीष्मजीने कहा--तात! मांस और मदिराका त्याग ब्रह्मचर्यसे भी श्रेष्ठ है--वही उत्तम ब्रह्मचर्य है। वेदोक्त मर्यादामें स्थित रहना सबसे श्रेष्ठ धर्म है तथा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना ही सर्वोत्तम पवित्रता है
ভীষ্মে ক’লে— তাত, ব্ৰহ্মচৰ্যতকৈও শ্ৰেষ্ঠ মধু/মদ্য আৰু মাংস বর্জন। বেদোক্ত মৰ্যাদাৰ ভিতৰত স্থিত থাকাই ধৰ্ম; তাৰ লক্ষণ শম—অৰ্থাৎ মন আৰু ইন্দ্ৰিয়ৰ সংযম। এইয়েই শ্ৰেষ্ঠতম শৌচ।
Verse 26
युधिछिर उवाच कस्मिन् काले चरेद् धर्म कस्मिन् काले<र्थमाचरेत् । कस्मिन् काले सुखी च स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— পিতামহ, কোন সময়ত ধৰ্ম আচৰণ কৰিব লাগে? কোন সময়ত অৰ্থ (লৌকিক সাধন) সাধিব লাগে? আৰু কোন সময়ত মানুহ সুখী হ’ব পাৰে? মোক কওক।
Verse 27
युधिष्ठिने पूछा-पितामह! मनुष्य किस समय धर्मका आचरण करे? कब अर्थोपार्जनमें लगे तथा किस समय सुखभोगमें प्रवृत्त हो? यह मुझे बताइये ।। भीष्म उवाच कल्यमर्थ निषेवेत ततो धर्ममनन्तरम् | पश्चात् काम॑ निषेवेत न च गच्छेत् प्रसड्भिताम्,भीष्मजीने कहा--राजन! पूर्वाह्नमें धनका उपार्जन करे, तदनन्तर धर्मका और उसके बाद कामका सेवन करे; परंतु काममें आसक्त न हो
ভীষ্মে ক’লে— ৰাজন, প্ৰথমে যথোচিত সময়ত অৰ্থসাধন কৰা; তাৰ পিছত বিলম্ব নকৰাকৈ ধৰ্ম আচৰণ কৰা; তাৰ পাছতহে কাম (সুখভোগ) গ্ৰহণ কৰা। কিন্তু কামত আসক্ত হৈ অতিভোগলৈ নাযাবা।
Verse 28
ब्राह्मणांश्वैव मन्येत गुरूंश्वाप्पभिपूजयेत् । सर्वभूतानुलोमश्न मृदुशील: प्रियंवद:,ब्राह्मणोंका सम्मान करे। गुरुजनोंकी सेवा-पूजामें संलग्न रहे। सब प्राणियोंके अनुकूल रहे। नम्रताका बर्ताव करे और सबसे मीठे वचन बोले
ব্ৰাহ্মণসকলক সন্মান কৰিব লাগে আৰু গুৰুজনক যথোচিতভাৱে সেৱা-পূজা কৰিব লাগে। সকলো প্ৰাণীৰ প্ৰতি অনুকূল থাকিব লাগে, স্বভাৱত মৃদু হ’ব লাগে, আৰু প্ৰিয় বাক্য ক’ব লাগে।
Verse 29
अधिकारे यदनृतं यच्च राजसु पैशुनम् । गुरोश्वालीककरणं तुल्य॑ तद् ब्रह्म॒हत्यया,न्यायका अधिकार पाकर झूठा फैसला देना अथवा न्यायालयमें जाकर झूठ बोलना, राजाओंके पास किसीकी चुगली करना और गुरुके साथ कपटपूर्ण बर्ताव करना--ये तीन ब्रह्महत्याके समान पाप हैं
ভীষ্মে ক’লে—কৰ্তব্য-কাৰ্যত, বিশেষকৈ ন্যায়-নিৰ্ণয়ত মিছা কোৱা; ৰজাসকলৰ আগত পৈশুন্য/চুগলি কৰা; আৰু গুৰুৰ প্ৰতি কপট আচৰণ কৰা—এই তিনিও পাপ ব্ৰাহ্মণহত্যাৰ সমান বুলি গণ্য।
Verse 30
प्रहरेन्न नरेन्द्रेषु न हन्याद् गां तथैव च । भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते,राजाओं पर प्रहार न करे और गायको न मारे। जो राजा और गौपर प्रहाररूप द्विविध दुष्कर्मका सेवन करता है, उसे भ्रूणहत्याके समान पाप लगता है
ভীষ্মে ক’লে—ৰজাসকলৰ ওপৰত আঘাত নকৰিবা; আৰু তদ্ৰূপ গাই হত্যা নকৰিবা। যি এই দুয়োটাৰ যিকোনো এটা দুষ্কৰ্ম কৰে—ৰাজহিংসা বা গোহত্যা—তাৰ পাপ ভ্ৰূণহত্যাৰ সমান।
Verse 31
नाग्निं परित्यजेज्जातु न च वेदान् परित्यजेत् । नच ब्राह्मणमाक्रोशेत् सम॑ तद् ब्रह्महत्यया,अग्निहोत्रका कभी त्याग न करे। वेदोंका स्वाध्याय न छोड़े तथा ब्राह्मणकी निन्दा न करे; क्योंकि ये तीनों दोष ब्रह्महत्याके समान हैं
ভীষ্মে ক’লে—পবিত্ৰ অগ্নিক কেতিয়াও ত্যাগ নকৰিবা; বেদৰ স্বাধ্যায়-পাঠ ত্যাগ নকৰিবা; আৰু ব্ৰাহ্মণক নিন্দা/গালি নিদিবা। এই তিনিও দোষ ব্ৰাহ্মণহত্যাৰ সমান।
Verse 32
युधिछिर उवाच कीदृशा: साधवो वितप्रा: केभ्यो दत्त महाफलम् | कीदृशानां च भोक्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! कैसे ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये? किनको दिया हुआ दान महान् फल देनेवाला होता है? तथा कैसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये? यह मुझे बताइये
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—পিতামহ! কেনে ধৰণৰ ব্ৰাহ্মণ সত্যই সাধু আৰু শ্ৰেষ্ঠ বুলি গণ্য? কাক দিয়া দান মহাফল দিয়ে? আৰু কেনে ধৰণৰ ব্ৰাহ্মণক ভোজন কৰাব লাগে? সেয়া মোক কওক।
Verse 33
भीष्म उवाच अक्रोधना धर्मपरा: सत्यनित्या दमे रता: | तादृशा: साधवो वित्रास्तेभ्यो दत्त महाफलम्,भीष्मजीने कहा--राजन्! जो क्रोधरहित, धर्मपरायण, सत्यनिष्ठ और इन्द्रियसंयममें तत्पर हैं, ऐसे ब्राह्मणोंको श्रेष्ठ समझना चाहिये और उन्हींको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है (अतः उन्हींको श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये)
ভীষ্মে ক’লে—ৰাজন! যিসকল ব্ৰাহ্মণ ক্ৰোধৰহিত, ধৰ্মপৰায়ণ, সত্যত স্থিৰ আৰু ইন্দ্ৰিয়সংযমত ৰত—তেওঁলোকেই সত্য সাধু আৰু শ্ৰেষ্ঠ। তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফল দিয়ে (সেয়ে শ্রাদ্ধাদি কৰ্মত তেওঁলোককেই ভোজন কৰাব লাগে)।
Verse 34
अमानिन: सर्वसहा दृढार्था विजितेन्द्रिया: । सर्वभूतहिता मैत्रास्ते भ्यो दत्त महाफलम्
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল অহংকাৰশূন্য, সকলো দুখ-কষ্ট সহনশীল, সংকল্পত দৃঢ়, ইন্দ্ৰিয়জয়ী, আৰু সকলো প্ৰাণীৰ হিতৈষী তথা মৈত্ৰীভাবসম্পন্ন—তেনে লোকক দিয়া দান মহাফলদায়ক।
Verse 35
जिनमें अभिमानका नाम नहीं है, जो सब कुछ सह लेते हैं, जिनका विचार दृढ़ है, जो जितेन्द्रिय, सम्पूर्ण प्राणियोंक हितकारी तथा सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फल देनेवाला है ।। अलुब्धा: शुचयो वैद्या ह्वीमन्त: सत्यवादिन: । स्वकर्मनिरता ये च तेभ्यो दत्त महाफलम्,जो निर्लोभ, पवित्र, विद्वान, संकोची, सत्यवादी और अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान भी महान् फलदायक होता है
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল নিৰ্লোভ, শুচি, বিদ্বান, লজ্জাশীল, সত্যবাদী আৰু নিজ কৰ্মত নিৰত—তেনে লোকক দিয়া দানেও মহাফল দিয়ে।
Verse 36
साड़ांश्व चतुरो वेदानधीते यो द्विजर्षभ: । षड्भ्य: प्रवृत्त: कर्मभ्यस्तं पात्रमृषयो विदु:,जो श्रेष्ठ ब्राह्मण अंगोंसहित चारों वेदोंका अध्ययन करता और ब्राह्मणोचित छ: कर्मों (अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन और दान-प्रतिग्रह) में प्रवृत्त रहता है, उसे ऋषिलोग दानका उत्तम पात्र समझते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যি দ্বিজশ্ৰেষ্ঠে বেদাঙ্গসহ চাৰিও বেদ অধ্যয়ন কৰে আৰু ব্ৰাহ্মণোচিত ষড়্কৰ্মত—অধ্যয়ন-অধ্যাপন, যজন-যাজন, দান-প্ৰতিগ্ৰহ—প্ৰবৃত্ত থাকে, ঋষিসকলে তাক দানৰ উত্তম পাত্ৰ বুলি জানে।
Verse 37
ये त्वेवंगुणजातीयास्तेभ्यो दत्त महाफलम् | सहस्रगुणमाप्रोति गुणाहाय प्रदायक:
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল সত্যই এনে গুণসম্পন্ন, তেওঁলোকক দিয়া দান মহাফল দিয়ে। গুণ চিনাকি দান কৰা দাতাই সহস্ৰগুণ ফল লাভ কৰে।
Verse 38
जो ब्राह्मण ऊपर बताये हुए गुणोंसे युक्त होते हैं, उन्हें दिया हुआ दान महान् फल देनेवाला है। गुणवान् एवं सुयोग्य पात्रको दान देनेवाला दाता सहसख्रगुना फल पाता है ।। प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वित: । तारयेत कुल॑ सर्वमेको<5पीह द्विजर्षभ:,यदि उत्तम बुद्धि, शास्त्रकी विद्वत्ता, सदाचार और सुशीलता आदि उत्तम गुणोंसे सम्पन्न एक श्रेष्ठ ब्राह्मण भी दान स्वीकार कर ले तो वह दाताके सम्पूर्ण कुलका उद्धार कर देता है
ভীষ্মে কয়—পূৰ্বোক্ত গুণসম্পন্ন ব্ৰাহ্মণক দিয়া দান মহাফলদায়ক; আৰু গুণবান তথা যোগ্য পাত্ৰক দান কৰা দাতাই সহস্ৰগুণ ফল পায়। উত্তম প্ৰজ্ঞা, শাস্ত্ৰশ্ৰৱণজন্য বিদ্যা, সদাচাৰ আৰু সুশীলতাৰে সমন্বিত এজন দ্বিজশ্ৰেষ্ঠেও যদি ইয়াত দান গ্ৰহণ কৰে, তেন্তে তেওঁ দাতাৰ সমগ্ৰ কুলক উদ্ধাৰ কৰে।
Verse 39
गामश्चृ वित्तमन्नं वा तद्विधे प्रतिपादयेत् । द्रव्याणि चान्यानि तथा प्रेत्यभावे न शोचति,अतः ऐसे गुणवान् पुरुषको ही गाय, घोड़ा, अन्न, धन तथा दूसरे पदार्थ देने चाहिये। ऐसा करनेसे दाताको मरनेके बाद पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता
ভীষ্মে ক’লে—যোগ্য পাত্ৰক গাই, ঘোঁৰা, ধন, অন্ন আৰু অন্যান্য দ্ৰব্য দান কৰা উচিত। এইদৰে সঠিকভাৱে দান কৰিলে দাতা মৃত্যুৰ পিছত অনুতাপত নপৰে; সুপাত্ৰত নিবেদিত দান পৰলোকৰ শোকৰ পৰা ৰক্ষা কৰে আৰু ধৰ্মক প্ৰতিষ্ঠা কৰে।
Verse 40
तारयेत कुलं सर्वमेको5पीह द्विजोत्तम: । किमज़ पुनरेवैते तस्मात् पात्रं समाचरेत्,(तृप्ते तृप्ता: सर्व देवा: पितरो मुनयो5पि च ।) एक भी उत्तम ब्राह्मण श्राद्धकर्ताके समस्त कुलको तार सकता है। यदि उपर्युक्त बहुत- से ब्राह्मण तार दें इसमें तो कहना ही क्या है। अतः सुपात्रकी खोज करनी चाहिये। उससे तृप्त होनेपर सम्पूर्ण देवता, पितर और ऋषि भी तृप्त हो जाते हैं
ভীষ্মে ক’লে—ইয়াত এজন শ্ৰেষ্ঠ ব্ৰাহ্মণেও সমগ্ৰ কুলক উদ্ধাৰ কৰিব পাৰে; তেন্তে তেনে বহুজন থাকিলে আৰু কি ক’ব! সেয়ে সুপাত্ৰক সাৱধানে বিচাৰি সন্মান কৰিব লাগে। তেওঁ তৃপ্ত হ’লে সকলো দেৱতা, পিতৃগণ আৰু মুনিসকলেও তৃপ্ত বুলি গণ্য হয়।
Verse 41
निशम्य च गुणोपेतं ब्राह्म॒णं साधुसम्मतम् । दूरादानाय्य सत्कृत्य सर्वतश्नचापि पूजयेत्
ভীষ্মে ক’লে—গুণসম্পন্ন আৰু সজ্জনসকলৰ দ্বাৰা স্বীকৃত ব্ৰাহ্মণৰ কথা শুনিলে, তেওঁক দূৰৰ পৰা হলেও আনিব লাগে, যথোচিত সৎকাৰ কৰিব লাগে আৰু সকলো প্ৰকাৰে পূজা-আদৰ দেখুৱাব লাগে।
How an agent can incur brahmahatyā without literal killing—resolved by redefining ‘slaying’ as actions that dismantle life-support systems (alms, livelihood, water, dignity, and knowledge transmission).
Non-violence is not merely abstention from physical harm; it includes safeguarding access to essentials, truthful dealing with dependents, and restraint in speech that targets scripture or vulnerable persons.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the chapter functions as a definitional/legal-ethical taxonomy, emphasizing consequence through classification rather than promised merit.