
ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिः — Vyuṣṭi (Merit-Outcome) of Honoring Brāhmaṇas: Kṛṣṇa and Durvāsā
Upa-parva: Brāhmaṇa-Pūjā (Dvija-Satkāra) Upadeśa — Episode of Durvāsā and the Merit of Honoring Brāhmaṇas
Yudhiṣṭhira requests Kṛṣṇa to explain the specific ‘vyuṣṭi’—the resultant benefit or realized outcome—of brāhmaṇa-pūjā. Kṛṣṇa replies by affirming the decisive role attributed to brāhmaṇas for well-being in both this world and the next, and warns against anger toward them. He then narrates an illustrative incident: a brāhmaṇa ascetic identified with Durvāsā, neglected by others, is hosted by Kṛṣṇa. The sage’s unpredictable behavior and intense presence test hospitality and emotional restraint. A sequence involving food (pāyasa), an unusual anointing with remnants, and a public episode with Rukmiṇī escalates social tension; Kṛṣṇa nonetheless follows and pacifies the sage. Durvāsā declares Kṛṣṇa’s anger conquered, grants boons tied to fame, distinction, restoration of damaged property, and protection from fear, and instructs a posture of compliance toward brāhmaṇa requests. The chapter closes with Kṛṣṇa advising Yudhiṣṭhira to honor brāhmaṇas through speech and gifts, framing the episode as confirmation of Bhīṣma’s earlier teaching.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से विनयपूर्वक प्रार्थना करते हैं कि वे ऐसा धर्म-उपदेश सुनाएँ जो अर्थ से संयुक्त हो, भविष्य में सुख का उदय करे और लोक के लिए आश्चर्य-सा हो—क्योंकि इस दुर्लभ अवसर में उनके सिवा कोई शास्ता नहीं। → कथा का द्वार खुलता है: तपस्वी श्रीकृष्ण के पास महर्षियों का आगमन होता है। वे भगवान् द्वारा दिए गए हरे-सुनहरे कुशासन पर बैठते हैं और मधुर, धर्म-संहिता से युक्त संवाद आरम्भ होता है। ऋषि अपने देखे-सुने ‘आश्चर्य’ का संकेत देते हैं और हरि से निर्भयता व स्पष्टीकरण चाहते हैं; उनके भीतर भी एक क्षणिक व्यथा/आर्तता का भाव उभरता है, यद्यपि वे जितक्रोध-जितेन्द्रिय हैं। → श्रीकृष्ण का दिव्य प्रभाव प्रकट होता है: वे दग्ध हुए पर्वत को देखकर सौम्य दृष्टि-निपात से उसे पुनः प्रकृति में लौटा देते हैं—यह दृश्य ऋषियों के अनुभव को चरम ‘अद्भुत’ में बदल देता है और उनके प्रश्न का केन्द्र बनता है। → ऋषियों के आग्रह पर देवर्षि नारद ‘पूर्ववृत्त’ कथा का प्रवचन आरम्भ करते हैं—अर्थात् आश्चर्य के कारण, उसके धर्मार्थ संकेत और उसके पीछे की दिव्य-व्यवस्था का कथात्मक उद्घाटन शुरू होता है। → नारद द्वारा आरम्भ की गई ‘पूर्वघटित’ कथा आगे विस्तार माँगती है—आश्चर्य का मूल कारण और उसका धर्म-निष्कर्ष अगले प्रसंगों में पूर्ण रूप से खुलने का संकेत देता है।
Verse 1
ऑपनआक्ा बछ। अर: एकोनचत्वारिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: तपस्वी श्रीकृष्णके पास ऋषियोंका आना, उनका प्रभाव देखना और उनसे वार्तालाप करना युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । आगमैर्बहुभि: स्फीतो भवान् न: प्रवरे कुले,युधिष्ठटिरने पूछा--महाप्राज्ञ पितामह! आप हमारे श्रेष्ठ कुलमें सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशिष्ट विद्वान और अनेक आगमोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—“মহাপ্ৰাজ্ঞ পিতামহ! আপুনি সৰ্বশাস্ত্ৰত বিশাৰদ। বহু আগমৰ জ্ঞানৰে সমৃদ্ধ হৈ আপুনি আমাৰ শ্ৰেষ্ঠ কুলত অগ্ৰগণ্য।”
Verse 2
त्वत्तो धर्मार्थसंयुक्तमायत्यां च सुखोदयम् | आश्चर्यभूतं लोकस्य श्रोतुमिच्छाम्यरिंदम,शत्रुदमन! मैं आपके मुखसे अब ऐसे विषयका वर्णन सुनना चाहता हूँ, जो धर्म और अर्थसे युक्त, भविष्यमें सुख देनेवाला और संसारके लिये अद्भुत हो
“অৰিন্দম! আপোনাৰ মুখৰ পৰা মই এনে বৰ্ণনা শুনিবলৈ ইচ্ছা কৰোঁ, যি ধৰ্ম আৰু অৰ্থে সংযুক্ত, যি ভৱিষ্যতে সুখোদয় ঘটায়, আৰু যি শুনি জগত বিস্মিত হয়।”
Verse 3
अयं च काल: सम्प्राप्तो दुर्लभो ज्ञातिबान्धवै: । शास्ता च न हि नः कश्ित् त्वामृते पुरुषर्षभ,पुरुषप्रवर! हमारे बन्धु-बान्धवोंको यह दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है। हमारे लिये आपके सिवा दूसरा कोई समस्त धर्मोका उपदेश करनेवाला नहीं है
“পুৰুষর্ষভ! আমাৰ জ্ঞাতি-বন্ধুসকলৰ বাবে এই দুৰ্লভ সময় এতিয়া উপস্থিত হৈছে। আৰু আপোনাক বাদ দি আমাৰ বাবে সমগ্ৰ ধৰ্মৰ উপদেশ দিয়া সত্যই আন কোনো নাই।”
Verse 4
यदि ते5हमनुग्राह्मो भ्रातृभिः सहितोडनघ । वक्तुमहसि नः प्रश्न॑ यत् त्वां पृच्छामि पार्थिव,अनघ! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह हो तो पृथ्वीनाथ! मैं आपसे जो प्रश्न पूछता हूँ, उसका हम सब लोगोंके लिये उत्तर दीजिये
হে অনঘ! যদি মই মোৰ ভ্ৰাতৃসকলৰ সৈতে আপোনাৰ অনুগ্ৰহৰ যোগ্য হওঁ, তেন্তে হে পৃথিৱীনাথ, মই যি প্ৰশ্ন আপোনাক সুধিবলৈ যাওঁ, তাৰ উত্তৰ আমাৰ সকলোৰে বাবে দিয়া।
Verse 5
अयं नारायण: श्रीमान् सर्वपार्थिवसम्मतः । भवन्तं बहुमानेन प्रश्रयेण च सेवते,सम्पूर्ण नरेशोंद्वारा सम्मानित ये श्रीमान् भगवान् नारायण श्रीकृष्ण बड़े आदर और विनयके साथ आपकी सेवा करते हैं
এই শ্ৰীমান্ নাৰায়ণ—যাক সকলো ৰজাই সন্মান আৰু স্বীকৃতি দিয়ে—তেওঁ আপোনাক মহা মান-সম্মান আৰু বিনয়েৰে সেৱা কৰে।
Verse 6
अस्य चैव समक्ष त्वं पार्थिवानां च सर्वश: । भ्रातृणां च प्रियार्थ मे स््नेहाद् भाषितुमरहसि,इनके तथा इन भूपतियोंके सामने मेरा और मेरे भाइयोंका सब प्रकारसे प्रिय करनेके लिये इस पूछे हुए विषयका सस्नेह वर्णन कीजिये
ইয়াৰ সন্মুখত আৰু এই সকলো ৰজাৰ সন্মুখতো, মোৰ আৰু মোৰ ভ্ৰাতৃসকলৰ প্ৰিয়-হিতৰ বাবে, স্নেহবশত এই সুধা বিষয়টো বৰ্ণনা কৰা আপোনাৰ উচিত।
Verse 7
भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचन श्रुत्वा स्नेहादागतसम्भ्रम: । भीष्मो भागीरथीपुत्र इदं वचनमत्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर स्नेहके आवेशसे युक्त हो गंगापुत्र भीष्मने यह बात कही
বৈশম্পায়নে ক’লে—হে জনমেজয়! যুধিষ্ঠিৰৰ সেই বাক্য শুনি, স্নেহজাত আবেগে উদ্দীপ্ত ভাগীৰথীপুত্ৰ ভীষ্মে এই কথা ক’লে।
Verse 8
भीष्म उवाच अहं ते कथयिष्यामि कथामतिमनोहराम् । अस्य विष्णो: पुरा राजन् प्रभावो यो मया श्रुत:,भीष्मजी बोले--बेटा! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त मनोहर कथा सुना रहा हूँ। राजन! पूर्वकालमें इन भगवान् नारायण और महादेवजीका जो प्रभाव मैंने सुन रखा है, उसको तथा पार्वतीजीके संदेह करनेपर शिव और पार्वतीमें जो संवाद हुआ था, उसको भी बता रहा हूँ, सुनो
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! মই তোমাক এক অতি মনোহৰ কাহিনী ক’ম। এই বিষ্ণুৰ যি প্ৰাচীন মহিমা মই শুনিছোঁ, সেয়াই মই তোমাক বৰ্ণনা কৰিম।
Verse 9
यश्न गोवृषभाड्कस्य प्रभावस्तं च मे शृणु । रुद्राण्या: संशयो यश्व दम्पत्योस्तं च मे शृणु,भीष्मजी बोले--बेटा! अब मैं तुम्हें एक अत्यन्त मनोहर कथा सुना रहा हूँ। राजन! पूर्वकालमें इन भगवान् नारायण और महादेवजीका जो प्रभाव मैंने सुन रखा है, उसको तथा पार्वतीजीके संदेह करनेपर शिव और पार्वतीमें जो संवाद हुआ था, उसको भी बता रहा हूँ, सुनो
ভীষ্ম ক’লে—গোবৃষভ-চিহ্নধাৰী প্ৰভুৰ মহিমা শুনা; ৰুদ্ৰাণী (পাৰ্বতী)ৰ মনত যি সংশয় উঠিছিল আৰু তাৰ পিছত দিৱ্য দম্পতি শিৱ–পাৰ্বতীৰ মাজত যি সংলাপ হৈছিল, সেয়াও শুনা। প্ৰাচীন কালৰ পৰা নাৰায়ণ আৰু মহাদেৱৰ মহত্ত্ব আৰু তেওঁলোকৰ শক্তি-প্ৰভাৱ বিষয়ে মই যি শুনিছোঁ, সেই কথাই তোমাক বৰ্ণনা কৰোঁ।
Verse 10
व्रतं चचार धर्मात्मा कृष्णो द्वादशवार्षिकम् | दीक्षितं चागतौ द्रष्टमुभौ नारदपर्वतौ,पहलेकी बात है, धर्मात्मा भगवान् श्रीकृष्ण बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले व्रतकी दीक्षा लेकर (एक पर्वतके ऊपर) कठोर तपस्या कर रहे थे। उस समय उनका दर्शन करनेके लिये नारद और पर्वत-ये दोनों ऋषि वहाँ पधारे
ধৰ্মাত্মা শ্ৰীকৃষ্ণে বাৰ বছৰীয়া ব্ৰত গ্ৰহণ কৰি দীক্ষিত অৱস্থাত কঠোৰ তপস্যা কৰিছিল। সেই দীক্ষিত কৃষ্ণক দৰ্শন কৰিবলৈ নাৰদ আৰু পৰ্বত—এই দুজন মুনি তাত উপস্থিত হ’ল।
Verse 11
इनके सिवा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्य, देवल, काश्यप, हस्तिकाश्यप तथा अन्य साधु-महर्षि जो दीक्षा और इन्द्रियसंयमसे सम्पन्न थे, अपने देवोपम, तपस्वी एवं सिद्ध शिष्योंके साथ वहाँ आये
তেওঁলোকৰ উপৰিও শ্ৰীকৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাস, জপকাৰীসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ ধৌম্য, দেৱল, কাশ্যপ, হস্তিকাশ্যপ আৰু আন বহু সাধু মহর্ষি তাত আহিল। তেওঁলোক সকলোৱে দীক্ষা আৰু ইন্দ্ৰিয়-দমনৰে সমৃদ্ধ আছিল আৰু দেৱসদৃশ, তপস্বী তথা সিদ্ধ শিষ্যসকলৰ সৈতে উপস্থিত হ’ল।
Verse 12
अपरे चर्षय: सन््तो दीक्षादमसमन्विता: । शिष्यैरनुगता: सिद्धैर्देवकल्पैस्तपोधनै:,इनके सिवा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्य, देवल, काश्यप, हस्तिकाश्यप तथा अन्य साधु-महर्षि जो दीक्षा और इन्द्रियसंयमसे सम्पन्न थे, अपने देवोपम, तपस्वी एवं सिद्ध शिष्योंके साथ वहाँ आये
আন বহু ঋষিও—পবিত্ৰ, দীক্ষা আৰু ইন্দ্ৰিয়-দমনৰে সমৃদ্ধ—দেৱসদৃশ, তপোধন, সিদ্ধ শিষ্যসকলৰ সৈতে তাত আহিল।
Verse 13
कृष्णद्वैपायनश्वैव धौम्यश्न जपतां वर: । देवल: काश्यपश्नैव हस्तिकाश्यप एव च,तेषामतिथिसत्कारमर्चनीयं कुलोचितम् | देवकीतनय: प्रीतो देवकल्पमकल्पयत् देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने बड़ी प्रसन्नताके साथ देवोचित उपचारोंसे उन महर्षियोंका अपने कुलके अनुरूप आतिथ्य-सत्कार किया
কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাস, জপকাৰীসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ ধৌম্য, দেৱল, কাশ্যপ আৰু হস্তিকাশ্যপ—এইসকলৰ কুলধৰ্মানুসাৰে অতিথিসৎকাৰ আৰু অর্চনা কৰা হ’ল। দেৱকীনন্দন শ্ৰীকৃষ্ণ আনন্দিতচিত্তে দেৱোচিত উপচাৰে তেওঁলোকক সন্মান জনালে।
Verse 14
हरितेषु सुवर्णेषु बर्हिष्केषु नवेषु च । उपोपविविशु: प्रीता विष्टरेषु महर्षय:
হৃদয়ত আনন্দ লৈ মহর্ষিসকলে সেউজ আৰু সোণালী বৰ্ণৰ, পবিত্ৰ কুশঘাঁহে নিৰ্মিত নতুন আসনত শৃঙ্খলিত আৰু শান্তভাৱে উপবিষ্ট হ’ল; যজ্ঞক্ৰিয়া আৰু তাৰ পিছত হ’বলগীয়া ধৰ্মকথাৰ বাবে তেওঁলোকে নিজকে সাজু কৰিলে।
Verse 15
भगवानके दिये हुए हरे और सुनहरे रंगवाले कुशोंके नवीन आसनोंपर वे महर्षि प्रसन्नतापूर्वक विराजमान हुए ।। कथाश्षक्रुस्ततस्ते तु मधुरा धर्मसंहिता: । राजर्षीणां सुराणां च ये वसन्ति तपोधना:,तदनन्तर वे राजर्षियों, देवताओं और जो तपस्वी मुनि वहाँ रहते थे, उनके सम्बन्धमें धर्मयुक्त मधुर कथाएँ कहने लगे
ভগৱানে দিয়া সেউজ-সোণালী বৰ্ণৰ নতুন কুশাসনত মহর্ষিসকলে সন্তোষে উপবিষ্ট হ’ল। তাৰ পিছত তেওঁলোকে ধৰ্মসংহিতাৰে সঞ্জাত মধুৰ কাহিনী ক’বলৈ ধৰিলে—ৰাজর্ষি, দেৱতা আৰু তাত বাস কৰা তপোধন মুনিসকলৰ বিষয়ে।
Verse 16
ततो नारायण तेजो व्रतचर्येन्धनोत्थितम् । वक्त्रान्नि:सृत्य कृष्णस्य वल्विरद्भुतकर्मण:,तत्पश्चात् व्रतचर्यारूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ भगवान् नारायणका तेज अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णके मुखारविन्दसे निकलकर अग्निरूपमें प्रकट हो वृक्ष, लता, झाड़ी, पक्षी, मृगसमुदाय, हिंसक जन्तु तथा सर्पोंसहित उस पर्वतको जलाने लगा
তাৰ পিছত ব্ৰতাচৰণৰ ইন্ধনে যেন জ্বলি উঠা নাৰায়ণৰ তেজ, অদ্ভুতকৰ্মা শ্ৰীকৃষ্ণৰ মুখকমলৰ পৰা নিৰ্গত হৈ অগ্নিৰূপে প্ৰকাশ পালে; আৰু গছ-লতা-ঝোপঝাড়, পখী, মৃগসমূহ, হিংস্ৰ জন্তু আৰু সৰ্পসহ সেই পৰ্বত দহিবলৈ ধৰিলে।
Verse 17
सोअनि्निर्ददाह तं शैलं सद्रुमं सलताक्षुपम् । सपक्षिमृगसंघातं सश्वापदसरीसूपम्,तत्पश्चात् व्रतचर्यारूपी ईंधनसे प्रज्वलित हुआ भगवान् नारायणका तेज अद्भुतकर्मा श्रीकृष्णके मुखारविन्दसे निकलकर अग्निरूपमें प्रकट हो वृक्ष, लता, झाड़ी, पक्षी, मृगसमुदाय, हिंसक जन्तु तथा सर्पोंसहित उस पर्वतको जलाने लगा
সেই অগ্নিয়ে সেই শৈল দহিলে—গছ, লতা আৰু ঝোপঝাড়সহ; পখীৰ দল আৰু মৃগসমূহসহ; আৰু হিংস্ৰ জন্তু আৰু সৰ্পসহ।
Verse 18
मृगैश्न विविधाकारैर्हाहाभूतमचेतनम् । शिखरं तस्य शैलस्य मथितं दीनदर्शनम्,उस समय नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंका आर्तनाद चारों ओर फैल रहा था, मानो पर्ववका वह अचेतन शिखर स्वयं ही हाहाकार कर रहा हो। उस तेजसे दग्ध हो जानेके कारण वह पर्वतशिखर बड़ा दयनीय दिखायी देता था
বহু প্ৰকাৰৰ মৃগ আৰু অন্যান্য জীৱৰ আৰ্তনাদে চাৰিওফালে হাহাকাৰ উঠিল; যেন সেই শৈলৰ অচেতন শিখৰেই নিজে বিলাপ কৰিছে। সেই তেজত দগ্ধ হৈ পৰ্বতশিখৰ চূর্ণ-বিক্ষত আৰু দীনদৰ্শন হৈ পৰিল।
Verse 19
स तु वह्निर्महाज्वालो दग्ध्वा सर्वमशेषत: । विष्णो: समीप आगम्य पादौ शिष्यवदस्पृशत्,बड़ी-बड़ी लपटोंवाली उस आगने समस्त पर्वत-शिखरको दग्ध करके भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) के समीप आकर जैसे शिष्य गुरुके चरण छूता है, उसी प्रकार उनके दोनों चरणोंका स्पर्श किया और उन्हींमें वह विलीन हो गयी
মহাজ্বালাৰে দীপ্ত সেই অগ্নিয়ে সকলোকে নিঃশেষে দগ্ধ কৰি, তাৰ পাছত ভগৱান বিষ্ণু (শ্ৰীকৃষ্ণ)ৰ ওচৰলৈ আহি, শিষ্য যেন গুৰুৰ চৰণ স্পৰ্শ কৰে তেনেদৰে তেওঁৰ দুয়োটা চৰণ স্পৰ্শ কৰিলে; আৰু তাতেই ভক্তি-বিনয়েৰে তেওঁৰ মাজত লীন হৈ গ’ল।
Verse 20
ततो विष्णुर्गिरिं दृष्टवा निर्दग्धमरिकर्शन: । सौम्यैर्दष्टिनिपातैस्तं पुनः प्रकृतिमानयत्,तदनन्तर शत्रुसूदन श्रीकृष्णने उस पर्वतको दग्ध हुआ देखकर अपनी सौम्य दृष्टि डाली और उसे पुन: प्रकृतावस्थामें पहुँचा दिया--पहलेकी भाँति हरा-भरा कर दिया
তাৰ পাছত শত্রুদমন বিষ্ণুৱে দগ্ধ হোৱা সেই পৰ্বতটো দেখি, তাৰ ওপৰত নিজৰ সৌম্য আৰু মঙ্গলময় দৃষ্টি নিক্ষেপ কৰি তাক পুনৰ স্বাভাৱিক অৱস্থালৈ আনিলে—আগৰ দৰে সেউজ-শ্যামল কৰি তুলিলে।
Verse 21
तथैव स गिरिर्भूय: प्रपुष्पितलताद्रुम: । सपक्षिगणसंघुष्ट: सश्वापदसरीसूप:,वह पर्वत फिर पहलेकी ही भाँति खिली हुई लताओं और वृक्षोंसे सुशोभित होने लगा। वहाँ पक्षी चहचहाने लगे। वहाँ हिंसक पशु और सर्प आदि जीव-जन्तु जी उठे
তেনেদৰে সেই পৰ্বতটো পুনৰ আগৰ দৰে ফুলেৰে ভৰা লতা আৰু গছ-গছনিত শোভিত হ’ল। পক্ষীৰ জাকৰ কলৰৱে তাত গুঞ্জন উঠিল, আৰু বনৰীয়া জন্তু আৰু সাপ আদি সৰীসৃপো তাত পুনৰ চঞ্চল হৈ বিচৰণ কৰিবলৈ ধৰিলে।
Verse 22
(सिद्धचारणसंघैश्न प्रसन्नेरसपशोभित: । मत्तवारणसंयुक्तो नानापक्षिगणैर्युत: ।।) सिद्धों और चारणोंके समुदाय प्रसन्न होकर उस पर्वतकी शोभा बढ़ाने लगे। वह स्थान पुनः मतवाले हाथियों और नाना प्रकारके पक्षियोंसे सम्पन्न हो गया ।। तमद्भुतमचिन्त्यं च दृष्टवा मुनिगणस्तदा । विस्मितो हृष्टरोमा च बभूवास््राविलेक्षण:,इस अद्भुत और अचिन्त्य घटनाको देखकर ऋषियोंका समुदाय विस्मित और रोमांचित हो उठा। उन सबके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू भर आये
প্ৰসন্ন সিদ্ধ আৰু চাৰণসকলৰ সমূহে সেই পৰ্বতৰ শোভা বৃদ্ধি কৰিলে। সেই স্থান পুনৰ মত্ত গজ আৰু নানাবিধ পক্ষীৰ জাকেৰে পৰিপূৰ্ণ হ’ল। এই অদ্ভুত আৰু অচিন্ত্য ঘটনাটো দেখি মুনিগণ বিস্মিত হ’ল; দেহত ৰোমাঞ্চ উঠিল আৰু চকু আনন্দাশ্ৰুৰে ভৰি উঠিল।
Verse 23
ततो नारायणो दृष्टवा तानृषीन् विस्मयान्वितान् । प्रश्मितं मधुरं स्निग्धं॑ पप्रच्छ वदतां वर:,वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने उन ऋषियोंको विस्मयविमुग्ध हुआ देख विनय और स्नेहसे युक्त मधुर वाणीमें पूछा--
তেতিয়া নাৰায়ণস্বৰূপ, বক্তাসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ শ্ৰীকৃষ্ণে বিস্ময়াভিভূত সেই ঋষিসকলক দেখি, মৃদু হাঁহি, মধুৰতা আৰু স্নেহে ভৰা বাক্যৰে তেওঁলোকক সুধিলে।
Verse 24
किमर्थमृषिपूगस्य त्यक्तसड्रस्य नित्यश: । निर्ममस्यागमवतो विस्मय: समुपागत:,“महर्षियो! ऋषिसमुदाय तो आसक्ति और ममतासे रहित है! सबको शास्त्रोंका ज्ञान है, फिर भी आपलोगोंको आश्चर्य क्यों हो रहा है?
ভীষ্মে ক’লে—হে মহৰ্ষিসকল! আপোনালোক ঋষিগণ তো সদায় আসক্তিৰহিত, মমতাশূন্য আৰু শাস্ত্ৰজ্ঞ; তথাপি আপোনালোকৰ মাজত এই বিস্ময় কিয় উদ্ভৱ হৈছে?
Verse 25
एतन्मे संशयं सर्वे याथातथ्यमनिन्दिता: । ऋषयो वक्तुमर्न्ति निश्चितार्थ तपोधना:,“तपोधन ऋषियो! आप सब लोग सबके द्वारा प्रशंसित हैं, अतः मेरे इस संशयको निश्चित एवं यथार्थ-रूपसे बतानेकी कृपा करें”
ভীষ্মে ক’লে—হে অনিন্দ্য তপোধন ঋষিসকল! আপোনালোক সকলোৰে দ্বাৰা প্ৰশংসিত; সেয়ে মোৰ এই সংশয়ৰ যথাৰ্থ, স্পষ্ট আৰু নিশ্চিত সমাধান কৃপা কৰি কওক।
Verse 26
ऋषय ऊचु: भवान् विसृजते लोकान् भवान् संहरते पुन: । भवान् शीतं भवानुष्णं भवानेव च वर्षति,ऋषियोंने कहा--भगवन्! आप ही संसारको बनाते और आप ही पुनः उसका संहार करते हैं। आप ही सर्दी, आप ही गर्मी और आप ही वर्षा करते हैं
ঋষিসকলে ক’লে—হে ভগৱান! আপুনি নিজেই লোকসমূহক সৃষ্টি কৰে, আৰু আপুনি নিজেই পুনৰ সিহঁতক সংহাৰ কৰে। আপুনি নিজেই শীত, আপুনি নিজেই উষ্ণ; বৰষুণ বৰ্ষণ কৰাও আপুনিই।
Verse 27
पृथिव्यां यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । तेषां पिता त्वं माता त्वं प्रभु: प्रभव एव च
ভীষ্মে ক’লে—পৃথিৱীত যিমান স্থাৱৰ আৰু চৰ ভূত আছে, সিহঁতৰ পিতা আপুনি, মাতা আপুনি; প্ৰভুও আপুনি, আৰু উৎপত্তিৰ মূলও আপুনিই।
Verse 28
इस पृथ्वीपर जो भी चराचर प्राणी हैं, उनके पिता-माता, प्रभु और उत्पत्तिस्थान भी आप ही हैं ।। एवं नो विस्मयकरं संशयं मधुसूदन । त्वमेवाहसि कल्याण वक्तुं वल्लेविनिर्गमम्,मधुसूदन! आपके मुखसे अग्निका प्रादुर्भाव हमारे लिये इस प्रकार विस्मपजनक हुआ है। हम संशयमें पड़ गये हैं। कल्याणमय श्रीकृष्ण! आप ही इसका कारण बताकर हमारे संदेह और विस्मयका निवारण कर सकते हैं
ভীষ্মে ক’লে—এই পৃথিৱীত যিমান স্থাৱৰ-চৰ প্ৰাণী আছে, সিহঁতৰ পিতা-মাতা, প্ৰভু আৰু উৎপত্তিস্থান আপুনিই। সেয়ে, হে মধুসূদন! আপোনাৰ মুখৰ পৰা অগ্নিৰ প্ৰাদুৰ্ভাৱ আমাৰ বাবে অতি বিস্ময়কৰ হৈ আমাক সংশয়ত পেলাইছে। হে কল্যাণময় শ্ৰীকৃষ্ণ! ইয়াৰ কাৰণ ক’লে আমাৰ সংশয় আৰু বিস্ময় দূৰ কৰিব পৰা আপুনিই।
Verse 29
ततो विगतसंत्रासा वयमप्यरिकर्शन । यच्छुतं यच्च दृष्टं नस्तत् प्रवक्ष्यामहे हरे,शत्रुसूदन हरे! उसे सुनकर हम भी निर्भय हो जायँगे और हमने जो आश्वर्यकी बात देखी या सुनी है, उसका हम आपके सामने वर्णन करेंगे
তাৰ পাছত, হে শত্রুদমন! ভয়মুক্ত হৈ আমিও, হে হৰি, আমি যি শুনিছোঁ আৰু যি দেখিছোঁ—সেই আশ্চৰ্য বিষয়সমূহ আপোনাৰ সন্মুখত যথাযথভাৱে বৰ্ণনা কৰিম।
Verse 30
वायुदेव उवाच एतद्ू वै वैष्णवं तेजो मम वक्त्राद् विनि:ःसृतम् । कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो येनायं मथितो गिरि:,श्रीकृष्ण बोले--मुनिवरो! मेरे मुखसे यह मेरा वैष्णव तेज प्रकट हुआ था; जिसने प्रलयकालकी अग्निके समान रूप धारण करके इस पर्वतको दग्ध कर डाला था
বায়ুদেৱে ক’লে—এইটো মোৰ বৈষ্ণৱ তেজ; ই মোৰ মুখৰ পৰা নিৰ্গত হৈছিল। ইয়াৰ পথ কৃষ্ণবৰ্ণ আছিল আৰু ই যুগান্তৰ অগ্নিৰ দৰে জ্বলি উঠিছিল। সেই শক্তিৰ দ্বাৰাই এই পৰ্বত মথিত আৰু দগ্ধ হৈছিল।
Verse 31
ऋषयश्चार्तिमापन्ना जितक्रोधा जितेन्द्रिया: । भवन्तो व्यथिताश्चासन् देवकल्पास्तपोधना:,उसी तेजसे आप-जैसे तपस्याके धनी, देवोपम शक्तिशाली, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय ऋषि भी पीड़ित और व्यथित हो गये थे
সেই তেজৰ প্ৰভাৱত, আপোনালোকৰ দৰে তপোধন, দেৱসদৃশ শক্তিমান, ক্ৰোধজয়ী আৰু জিতেন্দ্ৰিয় ঋষিসকলেও আর্তিত পৰি ব্যথিত হৈছিল।
Verse 32
व्रतचर्यापरीतस्य तपस्विव्रतसेवया । मम वह्लि: समुदभूतो न वै व्यथितुमर्हथ,मैं व्रतचर्यामें लगा हुआ था, तपस्वी जनोंके उस व्रतका सेवन करनेसे मेरा तेज ही अग्निरूपमें प्रकट हुआ था। अत: आपलोग उससे व्यथित न हों
মই ব্ৰতচৰ্যাত সম্পূৰ্ণ নিমগ্ন আছিলোঁ; তপস্বীসকলে যি ব্ৰত পালন কৰে, সেই ব্ৰত অনুশীলনৰ ফলত মোৰ তেজেই অগ্নিৰূপে প্ৰকাশ পাইছিল। সেয়ে আপোনালোক তাত ব্যথিত নহ’ব।
Verse 33
व्रतं चर्तुमिहायातस्त्वहं गिरिमिमं शुभम् | पुत्रं चात्मसमं वीर्ये तपसा लब्धुमागत:,मैं तपस्याद्वारा अपने ही समान वीर्यवान् पुत्र पानेकी इच्छासे व्रत करनेके लिये इस मंगलकारी पर्वतपर आया हूँ
মই এই শুভ পৰ্বতলৈ ব্ৰত পালন কৰিবলৈ আহিছোঁ; আৰু তপস্যাৰ দ্বাৰা মোৰ সমান বীৰ্যবান পুত্ৰ লাভ কৰাৰ অভিপ্ৰায়ে ইয়াত উপস্থিত হৈছোঁ।
Verse 34
ततो ममात्मा यो देहे सोग्निर्भूत्वा विनि:सृत: । गतश्न वरदं द्रष्टं सर्वलोकपितामहम्,मेरे शरीरमें स्थित प्राण ही अग्निके रूपमें बाहर निकलकर सबको वर देनेवाले सर्वलोक-पितामह ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये उनके लोकमें गया था
তেতিয়া মোৰ দেহত অৱস্থিত প্ৰাণেই অগ্নিৰূপ ধৰি বাহিৰলৈ ওলাই গ’ল আৰু সকলো লোকৰ পিতামহ, বৰদাতা ব্ৰহ্মাৰ দৰ্শন লাভ কৰিবলৈ তেওঁৰ লোকলৈ গমন কৰিলে।
Verse 35
तेन चात्मानुशिष्टो मे पुत्रत्वे मुनिसत्तमा: । तेजसोडर्धेन पुत्रस्ते भवितेति वृषध्वज:,मुनिवरो! उन ब्रह्माजीने मेरे प्राणको यह संदेश देकर भेजा है कि साक्षात् भगवान् शंकर अपने तेजके आधे भागसे आपके पुत्र होंगे
বায়ুৱে ক’লে—হে মুনিশ্ৰেষ্ঠ! তেওঁ মোক উপদেশ দি পুত্ৰলাভৰ বিষয়ে এই বাৰ্তাসহ পঠাইছে—‘বৃষধ্বজ স্বয়ং শংকৰ নিজৰ তেজৰ অর্ধাংশৰ পৰা তোমাৰ পুত্ৰ হ’ব।’
Verse 36
सो<यं वहल्लिरुपागम्य पादमूले ममान्तिकम् । शिष्यवत् परिचर्यार्थ शान्त: प्रकृतिमागत:,वही यह अग्निरूपी प्राण मेरे पास लौटकर आया है और निकट पहुँचनेपर शिष्यकी भाँति परिचर्या करनेके लिये उसने मेरे चरणोंमें प्रणाम किया है । इसके बाद शान्त होकर वह अपनी पूर्वावस्थाको प्राप्त हो गया है
বায়ুৱে ক’লে—সেই অগ্নিৰূপ প্ৰাণ ‘বহল্লি’ পুনৰ ঘূৰি আহি মোৰ পাদমূ’লৰ ওচৰলৈ উপস্থিত হ’ল। শিষ্যৰ দৰে সেবা কৰিবলৈ মোৰ পাদত প্ৰণাম কৰি, তাৰ পাছত শান্ত হৈ নিজৰ পূৰ্ব স্বভাৱলৈ উভতি গ’ল।
Verse 37
एतदेव रहस्यं व: पद्मनाभस्य धीमत: । मया प्रोक्ते समासेन न भी: कार्या तपोधना:,तपोधनो! यह मैंने आपलोगोंके निकट बुद्धिमान् भगवान् विष्णुका गुप्त रहस्य संक्षेपसे बताया है। आपलोगोंको भय नहीं मानना चाहिये
হে তপোধনসকল! এইয়েই জ্ঞানী পদ্মনাভ (বিষ্ণু) সম্পৰ্কীয় গূঢ় ৰহস্য, যি মই তোমালোকক সংক্ষেপে ক’লোঁ; সেয়ে ভয় নকৰিবা।
Verse 38
सर्वत्र गतिरव्यग्रा भवतां दीर्घदर्शनात् । तपस्थविव्रतसंदीप्ता ज्ञानविज्ञानशोभिता:,आपलोगोंकी गति सर्वत्र है, उसका कहीं भी प्रतिरोध नहीं है; क्योंकि आपलोग दूरदर्शी हैं। तपस्वी जनोंके योग्य व्रतका आचरण करनेसे आपलोग देदीप्यमान हो रहे हैं तथा ज्ञान और विज्ञान आपकी शोभा बढ़ा रहे हैं
বায়ুৱে ক’লে—তোমালোকৰ গতি সৰ্বত্ৰ নিৰ্বিঘ্ন; তোমালোক দূৰদৰ্শী হোৱাৰ বাবে ক’তো বাধা নপৰে। তপস্বীৰ উপযুক্ত ব্ৰতাচৰণে তোমালোক দীপ্তিমান, আৰু জ্ঞান-ৱিজ্ঞান তোমালোকৰ শোভা বৃদ্ধি কৰে।
Verse 39
यच्छुतं यच्च वो दृष्टं दिवि वा यदि वा भुवि | आश्चर्य परमं किंचित् तद् भवन्तो ब्रुवन्तु मे,इसलिये मेरी प्रार्थना है कि यदि आपलोगोंने इस पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई महान् आश्चर्यकी बात देखी या सुनी हो तो उसको मुझे बतलाइये
বায়ুৱে ক’লে—তোমালোকে যি কিবা শুনিছা আৰু যি কিবা দেখিছা—স্বৰ্গতেই হওক বা পৃথিৱীতেই—যদি কোনো পৰম আশ্চৰ্য বিষয় থাকে, তেন্তে অনুগ্ৰহ কৰি সেয়া মোক কোৱা।
Verse 40
तस्यामृतनिकाशस्य वाड्मधोरस्ति मे स्पृहा । भवद्धिः कथितस्येह तपोवननिवासिभि:,आपलोग तपोवनमें निवास करनेवाले हैं, इस जगत्में आपके द्वारा कथित अमृतके समान मधुर वचन सुननेकी इच्छा मुझे सदा बनी रहती है
অমৃতসম মধুৰ তোমালোকৰ বাক্য শুনিবলৈ মোৰ সদায় আকাঙ্ক্ষা থাকে। তোমালোক তপোবনৰ নিবাসী; সেয়ে এই লোকতেই তোমালোকৰ মুখেৰে কোৱা অমৃততুল্য বাণী শুনিবলৈ মই ইচ্ছা কৰোঁ।
Verse 41
यद्यप्यहमदृष्टं वो दिव्यमद्भुतदर्शनम् | दिवि वा भुवि वा किंचित् पश्याम्यमरदर्शना:,महर्षियो! आपका दर्शन देवताओंके समान दिव्य है। यद्यपि द्युलोक अथवा पृथिवीमें जो दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देनेवाली वस्तु है, जिसे आपलोगोंने भी नहीं देखा है, वह सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी प्रतिहत नहीं होता तथा मुझमें जो ऐश्वर्य है, वह मुझे आश्वर्यरूप नहीं जान पड़ता तथापि सत्पुरुषोंके कानोंमें पड़ा हुआ कथित विषय विश्वासके योग्य होता है और वह पत्थरपर खिंची हुई लकीरकी भाँति इस पृथ्वीपर बहुत दिनोंतक कायम रहता है
বায়ুৱে ক’লে—হে মহর্ষিসকল, তোমালোকৰ দৰ্শন দেৱতাসকলৰ দৰে দিৱ্য। স্বৰ্গতেই হওক বা পৃথিৱীতেই—যি কিবা দিৱ্য আৰু আশ্চৰ্যকৰ, যি তোমালোকেও দেখা নাই—সেয়া মই প্ৰত্যক্ষ দেখি। সৰ্বজ্ঞতা মোৰ শ্ৰেষ্ঠ স্বভাৱ; ই ক’তো বাধাপ্ৰাপ্ত নহয়। কিন্তু মোৰ ভিতৰত থকা ঐশ্বৰ্য মোৰ ওচৰত নিজে আশ্চৰ্য বুলি নালাগে। তথাপি সজ্জনৰ কাণত পৰি কোৱা-শুনা কথা শ্ৰদ্ধেয়; আৰু পাথৰত খোদিত ৰেখাৰ দৰে ই পৃথিৱীত দীৰ্ঘকাল স্থিৰ থাকে।
Verse 42
प्रकृति: सा मम परा न क्वचित् प्रतिहन्यते । न चात्मगतमैश्चूर्यमाश्षर्य प्रतिभाति मे,महर्षियो! आपका दर्शन देवताओंके समान दिव्य है। यद्यपि द्युलोक अथवा पृथिवीमें जो दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देनेवाली वस्तु है, जिसे आपलोगोंने भी नहीं देखा है, वह सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी प्रतिहत नहीं होता तथा मुझमें जो ऐश्वर्य है, वह मुझे आश्वर्यरूप नहीं जान पड़ता तथापि सत्पुरुषोंके कानोंमें पड़ा हुआ कथित विषय विश्वासके योग्य होता है और वह पत्थरपर खिंची हुई लकीरकी भाँति इस पृथ्वीपर बहुत दिनोंतक कायम रहता है
বায়ুৱে ক’লে—হে মহর্ষিসকল, মোৰ সেই পৰম প্ৰকৃতি ক’তো বাধাপ্ৰাপ্ত নহয়। আৰু মোৰ ভিতৰত থকা ঐশ্বৰ্যও মোৰ ওচৰত ‘আশ্চৰ্য’ বুলি নালাগে।
Verse 43
श्रद्धेयः कथितो हार्थ: सज्जनश्रवर्ण गत: । चिरं तिष्ठति मेदिन्यां शैले लेख्यामिवार्पितम्,महर्षियो! आपका दर्शन देवताओंके समान दिव्य है। यद्यपि द्युलोक अथवा पृथिवीमें जो दिव्य एवं अद्भुत दिखायी देनेवाली वस्तु है, जिसे आपलोगोंने भी नहीं देखा है, वह सब मैं प्रत्यक्ष देखता हूँ। सर्वज्ञता मेरा उत्तम स्वभाव है। वह कहीं भी प्रतिहत नहीं होता तथा मुझमें जो ऐश्वर्य है, वह मुझे आश्वर्यरूप नहीं जान पड़ता तथापि सत्पुरुषोंके कानोंमें पड़ा हुआ कथित विषय विश्वासके योग्य होता है और वह पत्थरपर खिंची हुई लकीरकी भाँति इस पृथ्वीपर बहुत दिनोंतक कायम रहता है
বায়ুৱে ক’লে—শ্ৰদ্ধেয় কথা এবাৰ কোৱা হৈ সজ্জনৰ কাণত পৰিলে, সেয়া পৃথিৱীত দীৰ্ঘকাল স্থিৰ থাকে—পাথৰত খোদিত লিখনৰ দৰে।
Verse 44
तदहं सज्जनमुखान्नि:सृतं तत्समागमे । कथयिष्याम्यहमहो बुद्धिदीपकरं नृणाम्,अतः मैं आप साधु-संतोंके मुखसे निकले हुए वचनको मनुष्योंकी बुद्धिका उद्दीपक (प्रकाशक) मानकर उसे सत्पुरुषोंके समाजमें कहूँगा
সেয়ে সজ্জনৰ মুখৰ পৰা নিৰ্গত সেই বাণী—যি মানুহৰ বুদ্ধিৰ দীপক—মই সৎপুৰুষসকলৰ সভাত বৰ্ণনা কৰিম।
Verse 45
ततो मुनिगणा: सर्वे विस्मिता: कृष्णसंनिधौ । नेत्रै: पद्मदलप्रख्यैरपश्यंस्त जनार्दनम्,यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके समीप बैठे हुए सभी ऋषियोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे कमलदलके समान खिले हुए नेत्रोंसे उनकी ओर देखने लगे
ই কথা শুনি কৃষ্ণসান্নিধ্যত উপবিষ্ট সকলো মুনিগণ বিস্ময়ে অভিভূত হ’ল। পদ্মদল সদৃশ প্ৰস্ফুটিত নয়নে তেওঁলোকে জনাৰ্দনক চাবলৈ ধৰিলে।
Verse 46
वर्धयन्तस्तथैवान्ये पूजयन्तस्तथापरे । वाम्भिक्रग्भूषितार्थाभि: स्तुवन्तो मधुसूदनम्,कोई उन्हें बधाई देने लगा, कोई उनकी पूजा-प्रशंसा करने लगा और कोई ऋग्वेदकी अर्थयुक्त ऋचाओंद्वारा उन मधुसूदनकी स्तुति करने लगा
কিছুমানে অভিনন্দন-বচনেৰে তেওঁৰ মান বৃদ্ধি কৰিলে; কিছুমানে পূজা কৰি প্ৰশংসা কৰিলে; আৰু কিছুমানে অৰ্থসমৃদ্ধ ঋগ্বৈদিক ঋচাৰে মধুসূদনৰ স্তৱ গালে।
Verse 47
ततो मुनिगणा: सर्वे नारदं देवदर्शनम् । तदा नियोजयामासुर्वचने वाक्यकोविदम्,तदनन्तर उन सभी मुनियोंने बातचीत करनेमें कुशल देवदर्शी नारदको भगवान्की बातचीतका उत्तर देनेके लिये नियुक्त किया
তাৰ পাছত সকলো মুনিগণে দেবদৰ্শী আৰু বাক্যনিপুণ নাৰদক ভগৱানৰ কথোপকথনত উত্তৰ দিবলৈ নিযুক্ত কৰিলে।
Verse 48
मुनय ऊचु: यदाक्षर्यमचिन्त्यं च गिरौ हिमवति प्रभो । अनुभूत॑ मुनिगणैस्तीर्थयात्रापरैर्मुने,मुनि बोले--प्रभो! मुने! तीर्थयात्रापरायण मुनियोंने हिमालय पर्वतपर जिस अचिन्त्य आश्चर्यका दर्शन एवं अनुभव किया है, वह सब आप आरम्भसे ही ऋषिसमूहके हितके लिये भगवान् श्रीकृष्णको बताइये
মুনিসকলে ক’লে—হে প্ৰভো, হে মুনে! তীৰ্থযাত্ৰাপৰায়ণ মুনিগণে হিমৱৎ পৰ্বতত যি অক্ষয় আৰু অচিন্ত্য আশ্চৰ্য দৰ্শন কৰি প্ৰত্যক্ষভাৱে অনুভৱ কৰিছে, সেয়া আৰম্ভণিৰ পৰা ঋষিসমূহৰ হিতাৰ্থে ভগৱান শ্ৰীকৃষ্ণক কওক।
Verse 49
तद् भवानृषिसंघस्य हितार्थ सर्वमादित: । यथा दृष्ट हृषीकेशे सर्वमाख्यातुमहसि,मुनि बोले--प्रभो! मुने! तीर्थयात्रापरायण मुनियोंने हिमालय पर्वतपर जिस अचिन्त्य आश्चर्यका दर्शन एवं अनुभव किया है, वह सब आप आरम्भसे ही ऋषिसमूहके हितके लिये भगवान् श्रीकृष्णको बताइये
মুনিসকলে ক’লে—প্ৰভো! তীৰ্থযাত্ৰাপৰায়ণ মুনিসকলে হিমালয় পৰ্ব্বতত যি অচিন্ত্য আশ্চৰ্যৰ দৰ্শন আৰু অনুভৱ কৰিছে, সেই সকলো আপুনি আদিৰ পৰা ঋষিসঙ্ঘৰ হিতাৰ্থে ভগৱান শ্ৰীকৃষ্ণক জনাওক।
Verse 50
एवमुक्त: स मुनिभि्नारदों भगवान् मुनि: । कथयामास देवर्षि: पूर्ववृत्तामिमां कथाम्,मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवर्षि भगवान् नारदमुनिने यह पूर्वघटित कथा कही
মুনিসকলে এনেদৰে কোৱাৰ পিছত দেৱৰ্ষি ভগৱান নাৰদমুনিয়ে পূৰ্বে সংঘটিত এই কাহিনী ক’বলৈ আৰম্ভ কৰিলে।
Verse 138
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বৰ একশ আটত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Verse 139
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकोनचत्वारिंशदाधिकशततमो<ध्याय:
ইতি শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত একশ ঊনপঞ্চাশতম অধ্যায়।
The chapter investigates what concrete outcome (vyuṣṭi/fruit) follows from sustained honor and service toward brāhmaṇas, and how restraint under provocation functions as a decisive ethical test.
Hospitality combined with emotional restraint is presented as actionable dharma: one should avoid hostility toward learned ascetics, respond with respectful service, and treat such conduct as causally linked to prosperity, reputation, and protection.
Yes. The narrative explicitly links conduct to outcomes: the sage’s satisfaction yields boons (kīrti, distinction, restoration of what was damaged, and freedom from fear), while the implied counterfactual warns that anger or disrespect can produce severe adverse consequences.