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Shloka 15

अक्षहृदय-विद्या-प्रदानम्

Transmission of Akṣa-hṛdaya; Kali’s Exit and the Bibhītaka Refuge

अयमर्थो न संवेद्यो भीमे मात: कदाचन । त्वत्संनिधौ नियोक्ष्ये5हं सुदेव॑ द्विजसत्तमम्‌,“माँ! पिताजीको यह बात कदापि मालूम न होनी चाहिये। मैं तुम्हारे ही सामने विप्रवर सुदेवको इस कार्यमें लगाऊँगी। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे पिताजीको मेरा विचार ज्ञात न हो। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहती हो तो तुम्हें इसके लिये सचेष्ट रहना होगा

«يا أمّاه! لا ينبغي لأبي، الملك، أن يعلم بهذا قطّ. سأُنيط بهذه المهمة أمامكِ أنتِ نفسِكِ أكرمَ البراهمة، سُديفا. فابذلي جهدكِ كي لا يطّلع أبي على قصدي. إن كنتِ تريدين إرضائي، فعليكِ أن تجتهدي في هذا الأمر.»

बृहदश्च उवाच