अध्याय ३३ — कर्म, दैव, हठ, स्वभाव और पुरुषार्थ पर द्रौपदी का उपदेश
Draupadī on Action, Fate, and Human Effort
यदेन: कुरुते किंचिद् राजा भूमिमवाप्रुवन् । सर्व तन्नुदते पश्चाद् यज्जैरविपुलदक्षिणै:,“राजा पृथ्वीको अपने अधिकारमें करते समय युद्धजनित हिंसा आदिके द्वारा जो कुछ पाप करता है, वह सब राज्यप्राप्तिके पश्चात् भारी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा नष्ट कर देता है
قال فايشَمبايانا: «إن الملك، وهو ينال سلطان الأرض، قد يقترف شيئًا من الإثم بما ينشأ عن الحرب من قتلٍ وعنفٍ ونحوه؛ لكنه بعد أن يستقر له المُلك يمحو ذلك كله بإقامة يَجْناتٍ عظيمة تُبذَل فيها دَكْشِنَا وافرة (عطايا القربان).»
वैशम्पायन उवाच