अध्याय ३३ — कर्म, दैव, हठ, स्वभाव और पुरुषार्थ पर द्रौपदी का उपदेश
Draupadī on Action, Fate, and Human Effort
कुणीनामिव बिल्वानि पड्गूनामिव धेनव: । ह्ृतमैश्वर्यमस्माकं जीवतां भवत:ः कृते,'जैसे लूलोंके पाससे उनके बेलफल और पंगुओंके निकटसे उनकी गायें छिन जाती हैं और वे जीवित रहकर भी कुछ कर नहीं पाते, उसी प्रकार आपके कारण जीते-जी हमारे राज्यका अपहरण कर लिया गया
«كما تُنتَزع ثمارُ البِلفا من العاجز، وكما تُساق أبقارُ الأعرج من جواره وهو حيّ لا يملك دفعًا؛ كذلك بسببك سُلِبَتْ منا السيادةُ ونحن ما نزال أحياء.»
वैशम्पायन उवाच