Karṇa-kuṇḍala-kavaca-jijñāsā; Kuntibhoja’s hospitality and Pṛthā’s appointment (कर्णकुण्डलकवचजिज्ञासा)
स सम्प्रहारो ववृधे भीरूणां भयवर्धन: । लोमसंहर्षणो घोर: पुरा देवासुरे यथा,पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंमें जैसा भयंकर तथा रोमाज्चकारी युद्ध हुआ था, उसी प्रकार वानरों और निशाचरोंका वह युद्ध भयानकरूपसे बढ़ता जा रहा था। वह संग्राम कायरोंके भयको बढ़ानेवाला था
قال ماركاندييا: واشتدّ ذلك الالتحام وازداد، فكان يزيد الجبناء رعباً. كان قتالاً مروّعاً تقشعرّ له الأبدان، كما كان قديماً قتالُ الآلهة مع الأسورا.
मार्कण्डेय उवाच