Skanda-janma: Śivā/Svāhā, Agni, and the Manifestation of Guha
Mahābhārata 3.214
यतो न गुरुरप्येनं श्रावयेदुपपादयेत् । त॑ं विद्याद् ब्रह्मणो योगं वियोगं योगसंज्ञितम्,इसलिये दृश्य संसारसे वियोग करानेवाले और योग नामसे कहे जानेवाले इस ब्रह्मययोगको स्वयं जानना और सम्पादन करना चाहिये। गुरुको भी उचित है कि वह इसे अपात्र शिष्यके प्रति न सुनावे
لذلك ينبغي للمرء أن يعرف بنفسه ويُنجز «يوغا براهما»؛ تلك التي تُحدِث فِراقًا عن العالم المرئي، وتُسمّى «يوغا» غير أنّها في حقيقتها «فِييوغا» أي انفصال. وحتى المعلّم يحسن به ألّا يُسمِعها ولا يشرحها لتلميذٍ غير أهلٍ لها.
व्याध उवाच