Adhyāya 112: Ṛṣyaśṛṅga’s Description of an Exemplary Brahmacārī
Ascetic Presence and Vow-Practice
गतेन तेनास्मि कृतो विचेता गात्रं च मे सम्परिदह्मतीव । इच्छामि तस्यान्तिकमाशोु गन्तुं त॑ चेह नित्यं परिवर्तमानम्,उसके चले जानेसे मैं अचेत हो गया हूँ। मेरा शरीर जलता-सा जान पड़ता है। मैं चाहता हूँ, शीघ्र उसके पास ही चला जाऊँ अथवा वही यहाँ नित्य मेरे पास रहे
لمّا مضى، صرت كالمذهول، وكأن جسدي يحترق احتراقًا. أريد أن أمضي سريعًا إلى جواره؛ أو ليته يبقى هنا دائمًا، ملازمًا لي لا يفارقني.
ऋष्यशुड्र उवाच