Adhyāya 112: Ṛṣyaśṛṅga’s Description of an Exemplary Brahmacārī
Ascetic Presence and Vow-Practice
तथा फल वृत्तमथो विचित्र समाहरत् पाणिना दक्षिणेन । तद् भूमिमासाद्य पुनः पुनश्न ३-2 438 - 07ख पद च्चै:,उसके पास एक गोलाकार फल (गेंद) था, जिसपर वह अपने दाहिने हाथसे आघात करता था। वह फल (गेंद) पृथ्वीपर जाकर बार-बार ऊँचेकी ओर उछलता था; उस समय उसका रूप अद्भुत दिखायी देता था
ثم تناول بيمينه ثمرةً كرويةً عجيبة، وضربها بيده اليمنى. فكانت تلك الثمرة إذا لامست الأرض ارتدت إلى العلو مرةً بعد مرة؛ وفي تلك اللحظة بدا منظرها بديعًا مدهشًا.
ऋष्यशुड्र उवाच