सुरभि–इन्द्रसंवादः
Surabhi–Indra Dialogue as a Governance Exemplar
तत्राश्रीषं महाराज पुत्राणां तव विभ्रमम् | अनयं द्यूतरूपेण महाभयमुपस्थितम्,महाराज! वहीं मैंने सुना कि तुम्हारे पुत्रोंकी बुद्धि भ्रान्त हो गयी है। वे ह्यूतरूपी अनीतिमें प्रवृत्त हो गये और इस प्रकार जूएके रूपमें उनके ऊपर बड़ा भारी भय उपस्थित हो गया है
يا مَلِكًا عظيمًا! لقد سمعتُ هناك أن عقولَ أبنائك قد اضطربت وضلّت. فانخرطوا في طريقٍ غيرِ قويمٍ في صورةِ القِمار؛ وهكذا حلَّ بهم خوفٌ عظيم، متجسّدًا في هيئةِ ذلك القمار نفسه.
वैशम्पायन उवाच