अध्याय २९ — वासुदेव–संजय संवादः
Karma, Varṇa-Dharma, and the Ethics of Governance
सन्त्येव मे ब्राह्मणेभ्य: कृतानि भावीन्यथो नो बत वर्तयन्ति । तान् पश्यामि युक्तरूपांस्तथैव तामेव सिद्धि श्रावयेथा नृपं तम्,राजा दुर्योधनसे कहना, मैंने कुछ ब्राह्मणोंके लिये वार्षिक जीविका-वृत्तियाँ नियत कर रखी थीं, किंतु खेद है कि तुम्हारे कर्मचारीगण उन्हें ठीकसे नहीं चला रहे हैं। मैं उन ब्राह्मणोंको पुनः पूर्ववत् उन्हीं वृत्तियोंसे युता देखना चाहता हूँ। तुम किसी दूतके द्वारा मुझे यह समाचार सुना दो कि उन वृत्तियोंका अब यथावत्रूपसे पालन होने लगा है
santy eva me brāhmaṇebhyaḥ kṛtāni bhāvīny atho no bata vartayanti | tān paśyāmi yukta-rūpāṁs tathaiva tām eva siddhiṁ śrāvayethā nṛpaṁ tam ||
قال يودهيشثيرا: «لقد رتّبتُ حقًّا لبعض البراهمة معونةً سنويةً دائمة، غير أنّها—للأسف—لا تُنفَّذ على الوجه الصحيح. وأريد أن أرى أولئك البراهمة مُعانين كما كانوا من قبل، على نحوٍ لائق. فليُبلَّغ ذلك الملك—على يد رسول—أنّ تلك الأوقاف تُصان الآن وتُجرى على التمام كما ينبغي.»
युधिछिर उवाच