Ulūka’s Provocation and Keśava’s Counter-Message (उलूकदूत्ये केशवप्रत्युत्तरम्)
ब्राह्मे धनुषि चाचार्य वेदयोरन्तगं द्वयो: । युधि धुर्यमविक्षो भ्यमनीकचरमच्युतम्,“कुन्तीपुत्र! आचार्य द्रोण ब्राह्मवेद और धरनुर्वेद इन दोनोंके पारंगत पण्डित हैं। ये युद्धका भार वहन करनेमें समर्थ, अक्षोभ्य, सेनाके मध्यभागमें विचरनेवाले तथा युद्धके मैदानसे पीछे न हटनेवाले हैं। इन महातेजस्वी द्रोणको जो तुम जीतनेकी इच्छा रखते हो, वह मिथ्या साहसमात्र है। वायुने सुमेरु पर्वतको उखाड़ फेंका हो, यह कभी हमारे सुननेमें नहीं आया है (इसी प्रकार तुम्हारे लिये भी आचार्यको जीतना असम्भव है)
brāhme dhanuṣi cācārya vedayor antagaṃ dvayoḥ | yudhi dhuryam avikṣobhyaṃ anīkacaram acyutam ||
قال سنجيا: «يا ابنَ كونتي، إن المعلّم دْرونَ قد بلغ الغاية في الإحاطة بكلٍّ من العلم المقدّس (brahma-vidyā) وعلم القوس. وفي القتال هو من يحمل عبءَ الحرب في المقدّمة: لا يتزعزع، يجول في قلب الصفوف، ولا يولي الميدان ظهره قط. إن اشتهاءَ قهرِ دْرونَ المتلألئ ليس إلا تهوّرًا متبجّحًا. لم نسمع قط أن الريح اقتلعت جبلَ سوميرو—وكذلك، فهزيمةُ المعلّم عليك مستحيلة.»
संजय उवाच