Janamejaya’s Appeal for Pacification and Śaunaka’s Counsel on Humility (जनमेजय-शौनक संवादः)
दत्तमाहारमिच्छामि त्वया क्षुद् बाधते हि माम् । स तद्वचः प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहड्भम:,संचयो नास्ति चास्माकं मुनीनामिव भोजने । 'भाई! अब मुझे भूख सता रही है; इसलिये तुम्हारा दिया हुआ कुछ भोजन करना चाहता हूँ।” उसकी बात सुनकर कबूतर बोला--“भैया! मेरे पास सम्पत्ति तो नहीं है, जिससे मैं तुम्हारी भूख मिटा सकूँ। हमलोग वनवासी पक्षी हैं। प्रतिदिन चुगे हुए चारेसे ही जीवन निर्वाह करते हैं। मुनियोंके समान हमारे पास कोई भोजन का संग्रह नहीं रहता है'
dattam āhāram icchāmi tvayā kṣud bādhate hi mām | sa tad-vacaḥ pratiśrutya vākyam āha vihaṅgamaḥ, sañcayo nāsti cāsmākaṃ munīnām iva bhojane |
قال: «أريد أن آكل مما تستطيع أن تعطيني، فإن الجوع يعذّبني حقًّا». فلمّا سمع الطائر كلامه قال: «يا أخي، ليست عندنا ثروة ولا مؤونة مدّخرة نزيل بها جوعك. نحن طيورُ الغابة؛ لا نعيش إلا بما نلتقطه كلّ يوم. ومثل الزهّاد، لا نُبقي طعامًا مخزونًا».
भीष्म उवाच