Śīla-prāpti and Śīla-lakṣaṇa (शीलप्राप्ति-शीललक्षणम्) | On the Acquisition and Marks of Character
अपापो होवमाचार: क्षिप्रं बहुमतो भवेत् । पापान्यपि हि कृच्छाणि शमयेन्नात्र संशय:,जो राजा इस प्रकार अपना आचरण बना लेता है, वह शीघ्र ही निष्पाप होकर सबके सम्मानका पात्र बन जाता है। वह अपने कठिन-से-कठिन पापोंको भी शान्त (नष्ट) कर देता है--इसमें संशय नहीं है
من جعل سلوكه على هذا النحو بلا إثم، صار سريعًا موضع احترام الجميع. بل إنه يُسكّن ويُبيد حتى أعسر الآثام—ولا شك في ذلك.
कामन्दक उवाच