Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
हिरण्यकवचं देवं चन्द्रमौलिवि भूषणम् । प्रपद्ये शरणं देव॑ं परमेण समाधिना,पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ
hiraṇyakavacaṃ devaṃ candramaulivibhūṣaṇam | prapadye śaraṇaṃ devaṃ parameṇa samādhinā ||
يقول سنجيا: «ألجأ إلى ذلك الإله المتدرّع بدرعٍ من ذهب، المتزيّن بتاجٍ ذي هلالٍ قمري. وبأعلى درجات تركيز الذهن، أستسلم للإلهيّ ليكون لي وحده ملاذًا وحماية.»
संजय उवाच
The verse models śaraṇāgati (taking refuge): in crisis and moral darkness, one steadies the mind through samādhi-like focus and entrusts oneself to the Divine as the ultimate protector, rather than relying solely on human power.
In the Sauptika Parva’s aftermath of night-violence, Sañjaya voices a devotional invocation, identifying the Lord by iconic marks (golden armor, moon-crested crown) and declaring surrender with concentrated mind—framing the events within a theistic, protective appeal.