सूताभिजानीहि स्वकान् परान् वा रथान् ध्वजांश्वञापतत: समेतान् । युद्धवन् हाहं नाभिजानामि किंचि- न्मा सैन्यं स्वं छादयिष्ये पृषत्कै:,तत्पश्चात् बलवान् और बुद्धिमान भीमसेन हर्षसे उललसित हो अपने सारथिसे पुन: इस प्रकार बोले--'सूत! ये जो बहुत-से रथ और ध्वज एक साथ इधर बढ़े आ रहे हैं, उन्हें पहचानो तो सही! ये अपने पक्षके हैं या शत्रुपक्षके? क्योंकि युद्ध करते समय मुझे अपने- परायेका ज्ञान नहीं रहता, कहीं ऐसा न हो कि अपनी ही सेनाको बाणोंसे आच्छादित कर डालूँ
sañjaya uvāca |
sūtābhijānīhi svakān parān vā rathān dhvajāṃś cāpatataḥ sametān |
yuddhavan hāhaṃ nābhijānāmi kiñcin mā sainyaṃ svaṃ chādayiṣye pṛṣatkaiḥ ||
قال سنجيا: «يا سوتا، ميّزهم—أهم من جانبنا أم من جانب العدو—تلك العربات والرايات التي تندفع مجتمعة نحونا. فإني في لهيب القتال لا أعرف شيئًا على أنه “لنا” أو “لهم”؛ فلا يقع أن أُغشي جيشنا نفسه بسهامي.»
संजय उवाच