द्रोणविक्रमदर्शनम् / The Display of Droṇa’s Onslaught and the Debate on Pāṇḍava Regrouping
मनुष्यशीर्षपाषाणां शक्तिमीनां गदोडुपाम् । उष्णीषफेनवसनां विकीर्णान्त्रसरीसृपाम्,उन शौर्य-सम्पन्न, सत्यवादी, विद्वान, बलवान् और सत्यपराक्रमी महानुभाव द्रोणने उस युद्धस्थलमें रक्तकी भयंकर नदी बहा दी, जो प्रलयकालकी जलराशिके समान जान पड़ती थी। वह नदी भीरु पुरुषोंको भयभीत करनेवाली थी। उसमें कवच लहरें और ध्वजाएँ भँवरें थीं। वह मनुष्यरूपी तटोंको गिरा रही थी। हाथी और घोड़े उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राहोंके समान थे। तलवारें मछलियाँ थीं। उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। वीरोंकी हड्डियाँ बालू और कंकड़-सी जान पड़ती थीं। वह देखनेमें बड़ी भयानक थी। ढोल और नगाड़े उसके भीतर कछुए-से प्रतीत होते थे। ढाल और कवच उसमें डोंगियोंके समान तैर रहे थे। वह घोर नदी केशरूपी सेवार और घाससे युक्त थी। बाण ही उसके प्रवाह थे। धनुष स्रोतके समान प्रतीत होते थे। कटी हुई भुजाएँ पानीके सर्पोके समान वहाँ भरी हुई थीं। वह रणभूमिके भीतर तीव्र वेगसे प्रवाहित हो रही थी। कौरव और सूंजय दोनोंको वह नदी बहाये लिये जाती थी। मनुष्योंके मस्तक उसमें प्रस्तर-खण्डका भ्रम उत्पन्न करते थे। शक्तियाँ मीनके समान थीं। गदाएँ नाक थीं। उष्णीषवस्त्र (पगड़ी) फेनके तुल्य चमक रहे थे। बिखरी हुई आँतें सर्पाकार प्रतीत होती थीं। वीरोंका अपहरण करनेवाली वह उग्र नदी मांस तथा रक्तरूपी कीचड़से भरी थी। हाथी उसके भीतर ग्राह थे। ध्वजाएँ वृक्षके तुल्य थीं। वह नदी क्षत्रियोंको अपने भीतर डुबोनेवाली थी। वहाँ क्रूरता छा रही थी। शरीर (लाशें) ही उसमें उतरनेके लिये घाट थे। योद्धागण मगर-जैसे जान पड़ते थे। उसको पार करना बहुत कठिन था। वह नदी लोगोंको यमलोकमें ले जानेवाली थी। मांसाहारी जन्तु उसके आस- पास डेरा डाले हुए थे। वहाँ कुत्ते और सियारोंके झुंड जुटे हुए थे। उसके सब ओर महाभयंकर मांसभक्षी पिशाच निवास करते थे
sañjaya uvāca |
manuṣyaśīrṣapāṣāṇāṁ śaktimīnāṁ gadodupām |
uṣṇīṣaphenavasanāṁ vikīrṇāntrasarīsṛpām ||
قال سَنْجَيا: في ذلك الميدان اندفعتْ موجةُ نهرٍ من المذبحة: بدت رؤوسُ الناس كالحجارة في قاعه؛ وتحركت الرماحُ فيه كالأسماك؛ وكانت الدبابيسُ كالقوارب على سطحه؛ وتلألأت العمائمُ والملابسُ كالرغوة؛ والتوت الأحشاءُ المتناثرة كالأفاعي. إن الصورة تُلحّ على هول الحرب الأخلاقي: فحين يُقرَنُ البأسُ بالقتل الجماعي، يصير الميدانُ طوفانًا يحمل الجميع إلى الموت، دون تمييزٍ بين جانبٍ وآخر.
संजय उवाच
The verse is not a doctrinal instruction but an ethical warning through imagery: war reduces human bodies and heroic instruments into grotesque ‘natural’ features of a death-river. It underscores the Mahābhārata’s recurring tension—kṣatriya duty and prowess may be praised, yet the cost in suffering and dehumanization is starkly exposed.
Sañjaya reports the battlefield scene in Droṇa Parva using an extended metaphor: the combat zone appears like a terrifying river where heads are stones, spears are fish, maces are boats, turbans are foam, and entrails are serpents—conveying the overwhelming carnage and chaos of the fighting.