Aśvatthāmā’s Lamentation, Vow of Retaliation, and the Manifestation of the Nārāyaṇāstra (द्रोणपर्व, अध्याय १६६)
देवगन्धर्वदीपाद्यै: प्रभाभिरधिकोज्ज्वलै: । विरराज तदा भूमिग्रहैद्यौरिव भारत,भारत! उन्हींमें देवताओं और गन्धरवोंके भी दीप आदि जल रहे थे, जो अपनी विशेष प्रभाके कारण अधिक प्रकाशित हो रहे थे। उनके द्वारा उस समय रणभूमि नक्षत्रोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी
حينئذٍ كانت مصابيحُ الآلهةِ والغندرفا ومشاعلُهم موقدةً هناك، أشدَّ توهّجًا بما لها من ضياءٍ خاصّ. وبذلك النور بدا ميدانُ القتال في تلك الساعة كالسّماء المزدانة بالنجوم، يا بهاراتا.
संजय उवाच