द्रोणपर्व — अध्याय १६२: प्रातःसंध्यायां युद्धप्रवृत्तिः तथा रजोमेघे संमूढता
नेष्यामि प्रेतलोकाय होतन्मे मनसि स्थितम् । “इसीलिये द्रोणके जीते-जी अभी युद्धस्थलमें तेरा वध नहीं कर रहा हूँ। दुर्मते! इसी रातमें प्रभात होनेसे पहले आज तेरे पिताका वध करके फिर तुझे भी युद्धस्थलमें प्रेतलोकको भेज दूँगा। यही मेरे मनका निश्चित विचार है
संजय उवाच