द्रोणपर्व (अध्याय ११२) — कर्णभीमयोर्युद्धम्, दुर्योधनस्य रक्षणादेशः
Droṇa-parva 112: Karṇa–Bhīma Engagement and Duryodhana’s Protective Order
सर्वथाहमनुप्राप्त: सुकृच्छ त्वयि जीवति । इस अनन्त सैन्यसमुद्रमें डूबकर अर्जुन अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देगा। युद्धमें उसके मारे जानेपर मेरे-जैसा मनुष्य कैसे जीवित रह सकता है? युयुधान! तुम्हारे जीते-जी मैं सब प्रकारसे बड़े भारी संकटमें पड़ गया हूँ
«على كل حال، ما دمتَ حيًّا فقد وقعتُ في كربٍ شديد. في هذا البحر اللامتناهي من الجيوش سيغرق أرجونا، وقد يطرح حتى روحه. فإذا قُتل في الحرب، فكيف يحيا رجلٌ مثلي؟ يا يُيُوذانا، وأنت حيٌّ، لقد أُلقيتُ من كل وجهٍ في محنةٍ عظيمة.»
युधिष्ठिर उवाच