Vipulopākhyāna—Ruci-rakṣā and Śakra’s Māyā (विपुलोपाख्यानम्—रुचिरक्षणं शक्रमाया च)
भीष्म उवाच क्रिया भवति केषांचिदुपांशुव्रतमुत्तमम् । यो यो याचेत यत् किज्चित् सर्व दद्याम इत्यपि,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! कितने ही याचकोंका तो यज्ञ, गुरुदक्षिणा या कुटुम्बका भरण-पोषण आदि कार्य ही मनोरथ होता है और किन्हींका उत्तम मौनव्रतसे रहकर निर्वाह करना प्रयोजन होता है। इनमेंसे जो-जो याचक जिस किसी वस्तुकी याचना करे उन सबके लिये यही कहना चाहिये कि “हम देंगे” (किसीको निराश नहीं करना चाहिये)
bhīṣma uvāca
kriyā bhavati keṣāñcid upāṃśu-vratam uttamam |
yo yo yāceta yat kiñcit sarvaṃ dadyām ity api ||
قال بهيشما: «يا يودهيشثيرا، إنّ قومًا تكون غايتهم الأعمالُ الفاعلة—كواجبات القربان، وإيتاء guru-dakṣiṇā (هبة المعلّم)، والقيام بنفقة الأهل—فهذه عندهم المقصد المختار. وقومًا آخرين تكون أسمى رياضتهم أن يعيشوا بنذرِ كفٍّ صامتٍ (مراقبةٍ شبه همسٍ). لذلك، مهما سأل أيُّ سائلٍ شيئًا، فليُجَب بروح: “نعم، سأعطي”—ولا يُرَدَّ أحدٌ خائبًا.»
भीष्म उवाच