Aṣṭāvakra–Strī-saṃvāda: Dhṛti, hospitality, and a dispute on autonomy
संहृष्टे: पार्षदैर्जुष्ट नृत्यद्भिविविधाननै: | दिव्याड्ररागै: पैशाचैरन्यैर्नानाविधै: प्रभो:,वहाँ नाना प्रकारके मुखवाले भाँति-भाँतिके दिव्य अंगराग लगाये अनेकानेक पिशाच तथा अन्य भूत-वैताल आदि भगवान् शिवके पार्षदगण हर्ष और उल्लासमें भरकर नाच रहे होंगे
هناك كان حاشيةُ شِيفا—من كثرةٍ من البيشاتشا، ومعهم سائرُ البهوتا والفيتالا—ذوو وجوهٍ شتّى، قد تطيّبوا بأدهانٍ سماويةٍ متنوعة، يرقصون ممتلئين فرحًا ونشوةً.
वदान्य उवाच