Duḥṣanta at Kaṇva-Āśrama; Śakuntalā’s Reception and Origin Prelude (दुःषन्तस्य कण्वाश्रमागमनम्)
त्वष्टाधरस्तथातन्रिक्ष द्वावन्यौ रौद्रकर्मिणौ । तेजसा सूर्यसंकाशा ब्रह्मलोकपरायणा:,इनके अतिरिक्त त्वष्टाधर तथा अत्रि ये दो पुत्र और हुए, जो रौद्र कर्म करने और करानेवाले थे। उशनाके सभी पुत्र सूर्यके समान तेजस्वी तथा ब्रह्मलोकको ही परम आश्रय माननेवाले थे
وكان له أيضًا ابنان آخران: تْوَشْطَادَهَرَ (Tvaṣṭādhara) وأَتْرِي (Atri)، يقومان بالأعمال الرُّودْرِيّة العنيفة ويُقيمانها ويُقيمها غيرُهما بأمرهما. وكان جميع أبناء أُشَنا يلمعون كالشمس، ويتخذون براهما-لوكا (Brahmaloka) ملاذًا أسمى.
वैशम्पायन उवाच