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Shloka 6

गरुडजन्म तथा विनतादास्यवृत्तान्तः

Garuḍa’s Birth and Vinatā’s Enslavement

ततः पुत्रसहसत्रं तु कद्रूर्जिह्यां चिकीर्षती । आज्ञापयामास तदा वाला भूत्वाञ्जनप्रभा:,कद्रू कुटिलता एवं छलसे काम लेना चाहती थी। उसने अपने सहस्र पुत्रोंकी इस समय आज्ञा दी कि तुम काले रंगके बाल बनकर शीघ्र उस घोड़ेकी पूँछमें लग जाओ, जिससे मुझे दासी न होना पड़े। उस समय जिन सर्पोने उसकी आज्ञा न मानी उन्हें उसने शाप दिया कि, “जाओ, पाण्डववंशी बुद्धिमान्‌ राजर्षि जनमेजयके सर्पयज्ञका आरम्भ होनेपर उसमें प्रज्वलित अग्नि तुम्हें जलाकर भस्म कर देगी”

ثم إن كَدْرُو—وقد انطوت على نيةٍ معوجّة وأرادت أن تنتفع بالمكر—أمرت أبناءها من الحيّات، وهم بالألوف، قائلةً: «ادخلوا سريعًا في ذاك الفرس، وكونوا كالشَّعر الأسود ملتصقين بذَنَبه، لكيلا أصير أَمَةً». وأمّا الحيّات اللواتي لم يطعنَّ أمرها فقد لعنتهنّ قائلةً: «حين يشرع الملكُ الرِّشيّ الحكيم جَنَمِجَيَ، من سلالة الباندَفَة، في قربان الحيّات، فإن نار ذلك القربان المتّقدة ستحرقكنّ حتى تصرن رمادًا».

शौनक उवाच