अध्याय १८४ — भैक्षविभागः, शयनविधानम्, धृष्टद्युम्नस्य निवेदनम्
Alms Distribution, Night Lodging, and Dhṛṣṭadyumna’s Report
मज्चेषु च पराघध्येषु पौरजानपदा जना: । कृष्णादर्शनसिद्धयर्थ सर्वतः समुपाविशन्,नगर और जनपदके लोगोंने जब देखा कि उक्त विमानोंमें बहुमूल्य मंचोंके ऊपर महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न परम सौभाग्यशाली, कालागुरुसे विभूषित, महान् कृपाप्रसादसे युक्त, ब्राह्मणभक्त, अपने-अपने राष्ट्रके रक्षक और शुभ पुण्यकर्मोंके प्रभावसे सम्पूर्ण जगतके प्रिय श्रेष्ठ नरपतिगण आकर बैठ गये हैं, तब राजकुमारी द्रौपदीके दर्शनका लाभ लेनेके लिये वे भी सब ओर सुखपूर्वक जा बैठे
vaiśampāyana uvāca |
maṇḍapeṣu ca parārdhyeṣu paurajānapadā janāḥ |
kṛṣṇādarśanasiddhyarthaṃ sarvataḥ samupāviśan ||
قال فايشَمبايانا: إن أهل المدينة وأهل الأرياف من حولها جلسوا من كل جانب في تلك الأجنحة البهيّة، لا يبتغون إلا غايةً واحدة: نيل الرؤية المباركة (دارشانا) لكِرِشنا (دراوبدي).
वैशम्पायन उवाच