अयम् अनुभवेद् बन्धुर् अनेन सह मे क्षयम् साम्यम् एकत्वतां यातो यादृशस् तादृशस् त्व् अहम् //
تُبيّن هذه الآية (27) ثمرات البرّ والإثم بحسب مراتب الكارما.