अवाप्तम् एतद् धि पुरा सनातनाद् धिरण्यगर्भाद् धि ततो नराधिप प्रसाद्य यत्नेन तम् उग्रतेजसं सनातनं ब्रह्म यथा त्वयैतत्
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