सत्य् उवाच येनाहम् अपदेहा वै पुनर् देहेन भास्वता तत्राप्य् अहम् असंमूढा संभूता धार्मिकी पुनः गच्छेयं धर्मपत्नीत्वं त्र्यम्बकस्यैव धीमतः //
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