Bala KandaPrakarana 3520 Verses

Prakarana 35

सोपान-प्रथम: ‘श्रद्धा का जन्म’ और ‘सम्बन्ध-स्थापन’ का द्वार। बालकाण्ड में भक्ति का अंकुर ‘सगुण-लीला’ के माध्यम से हृदय में उतरता है—गुरु, कुल, समाज, और विवाह-समारोह जैसे लोक-आधारों को ‘ईश्वर-सान्निध्य’ की सीढ़ी बनाकर। यहाँ जनक–दशरथ संवाद और अवध-प्रवेश का उत्सव साधक को यह सिखाता है कि विनय, प्रेम, मर्यादा और मंगल-आचार स्वयं मुक्ति-पथ के साधन हैं; ‘लोक’ (रीति) और ‘वेद’ (नीति) एक ही राम-तत्त्व में समाहित हैं।

此一断续片段(约多哈340–349)以“艳情(śṛṅgāra)”与“欢喜(harṣa)”为主调,而其根基实为“信爱之味(bhakti-rasa)”。遮那迦之谦恭、达沙罗陀之慈爱、向仙众礼敬、阿逾陀城的吉祥装点——皆非徒然外在庆典,而是“内心净化”的戏剧仪轨。图尔西达斯将世俗礼俗(灯供āratī、迎礼parichan、布施、装饰)化为法的建构:群体的欢悦乃“善会(satsaṅg)”之扩展,其中罗摩之瞻礼(darśana)被宣为“眼之果报(nayana-phala)”与“一切安乐之根”。同时又置入无相梵(nirguṇa brahman)之难测威德(“非此非彼”neti-neti),使行者明白:有相之甘美,正是无相之圆满显现。由是,《童年篇》此阶以“爱与谦(prema-vinaya)”为修持,使心柔软、谦下而专一,以备后续诸阶。

Verses

Verse 716 (चौपाई)

नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।। भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे।। बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी।। बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं।। पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए।। राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े।। तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी।। करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई।।

Verse 717 (दोहा/सोरठा)

कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति। मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति।।340।।

Verse 718 (चौपाई)

मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।। सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता।। जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए।। राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।। करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।। ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।। मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।। महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।

Verse 719 (दोहा/सोरठा)

नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल। सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकुल।।341।।

Verse 720 (चौपाई)

सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।। होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा।। मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।। मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें।। बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें।। सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे।। करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने।। बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही।।

Verse 721 (दोहा/सोरठा)

मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस। भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।342।।

Verse 722 (चौपाई)

बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।। जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई।। सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें।। जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं।। सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी।। कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई।। चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई।। रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।।

Verse 723 (दोहा/सोरठा)

बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत। अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत।।343।।

Verse 724 (चौपाई)

हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।। झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।। पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता।। निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे।। गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई।। बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना।। सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला।। लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी।।

Verse 725 (दोहा/सोरठा)

बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि। सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।

Verse 726 (चौपाई)

भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।। मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।। जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए।। देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।। जुथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि।। सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती।। भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।। कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।

Verse 727 (दोहा/सोरठा)

दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी। प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।

Verse 728 (चौपाई)

मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।। राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं।। बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे।। हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।। अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।। छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए।। सगुन सुंगध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।। रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।

Verse 729 (दोहा/सोरठा)

कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात। चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात।।346।।

Verse 730 (चौपाई)

धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।। सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं।। मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे।। प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि।। दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा।। सुर सुगन्ध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी।। समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा।। सुमिरि संभु गिरजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा।।

Verse 731 (दोहा/सोरठा)

होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ। बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।347।।

Verse 732 (चौपाई)

मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।। जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी।। बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे।। बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं।। पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे।। करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा।। आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी।। सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी।।

Verse 733 (दोहा/सोरठा)

एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर। मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार।।348।।

Verse 734 (चौपाई)

करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।। भूषन मनि पट नाना जाती।।करही निछावरि अगनित भाँती।। बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी।। पुनि पुनि सीय राम छबि देखी।।मुदित सफल जग जीवन लेखी।। सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही।। बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।। देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं।। देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।

Verse 735 (दोहा/सोरठा)

निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत। बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत।।349।।

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