Bala KandaPrakarana 2220 Verses

Prakarana 22

साधना-सीढ़ी का प्रथम सोपान: ‘श्रवण → संग → संस्कार’ से भक्ति का जन्म। बालकाण्ड में राम-लीला का प्रवेश ‘यज्ञ-रक्षा’ और ‘अहल्या-उद्धार’ जैसे प्रसंगों द्वारा होता है—जहाँ भय (असुर-उत्पात) का शमन, पाप/शाप (अहल्या) का विमोचन, और दर्शन-लालसा (मिथिला-नगर) का सौंदर्य-आस्वाद—तीनों मिलकर जिज्ञासु चित्त को शरणागति की ओर मोड़ते हैं। यह चरण साधक के भीतर ‘निर्भयता’ और ‘अनुग्रह’ का संस्कार बैठाता है: प्रभु की निकटता केवल राजसत्ता नहीं, करुणा-प्रधान धर्म-सेतु है।

此段以“英雄—悲悯—奇妙(वीर–करुण–अद्भुत)”三 रस 为主。开端罗摩无畏启程、为毗湿瓦密多之祭护持而诛玛利遮与苏跋胡,确立 वीर रस;然此勇是为“护法(धर्म-रक्षा)”,非为我慢之炫示。继之阿诃利娅(Ahalyā)一节成为悲悯与恩赐的中心:被诅咒束缚的觉性,因触主足尘而显发并赞颂——这是“以恩为本的解脱论”。再后,弥提罗城的描写以奇妙与恋慕之芬芳净化其心,阇那迦(Janaka)得见罗摩则化为“爱之激涌(प्रेम-उद्रेक)”。在义理上,图尔西显示“有相之戏(सगुण-लीला)”正是“无相梵(निर्गुण-ब्रह्म)”的易入显现:同一梵以“兼具二相(उभय बेष धरि)”而现童子之身。由是此段完成《बालकाण्ड》之阶梯功用——由闻而生爱,由爱而归依。

Verses

Verse 440 (चौपाई)

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।। होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी।। सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही।। बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।। पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।। मारि असुर द्विज निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी।। तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।। भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना।। तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।। धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।। आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं।। पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी।।

Verse 441 (दोहा/सोरठा)

गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।210।।

Verse 442 (छंद)

परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही।। अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।। धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।। मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।। मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना।। बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।। जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।। एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी।।

Verse 443 (दोहा/सोरठा)

अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल।।211।।

Verse 444 (चौपाई)

चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।। गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।। तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।। हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया।। पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी।। बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना।। गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।। बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता।।

Verse 445 (दोहा/सोरठा)

सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास। फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास।।212।।

Verse 446 (चौपाई)

बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई।। चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।। धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना।। चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई।। मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।। पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।। अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।। होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी।।

Verse 447 (दोहा/सोरठा)

धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति। सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति।।213।।

Verse 448 (चौपाई)

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।। बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।। सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।। पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा।। देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।। कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना।। भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता।। बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए।।

Verse 449 (दोहा/सोरठा)

संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति। चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति।।214।।

Verse 450 (चौपाई)

कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।। बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।। कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा।। तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई।। स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा।। उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए।। भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।। मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।

Verse 451 (दोहा/सोरठा)

प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर। बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।।215।।

Verse 452 (चौपाई)

कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।। ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।। सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।। ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ।। इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा।। कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।। ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।। रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए।।

Verse 453 (दोहा/सोरठा)

रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम। मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम।।216।।

Verse 454 (चौपाई)

मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।। सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता।। इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।। सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।। पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।। म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।। सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला।। करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।।

Verse 455 (दोहा/सोरठा)

रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु। बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु।।217।।

Verse 456 (चौपाई)

लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।। प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।। राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी।। परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई।। नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।। जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ।। सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती।। धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता।।

Verse 457 (दोहा/सोरठा)

जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ। करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।।

Verse 458 (चौपाई)

मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।। बालक बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा।। पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा।। तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी।। केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला।। सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन।। कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं।। चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी।।

Verse 459 (दोहा/सोरठा)

रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस। नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस।।219।।

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