विराटस्य सभां गत्वा भूमिपालासनेष्वथ । निषेदु: पावकप्रख्या: सर्वे धिष्ण्येष्विवाग्नय:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तदनन्तर नियत समयतक अपनी प्रतिज्ञाका पालन करके अग्निके समान तेजस्वी पाँचों भाई महारथी पाण्डव तीसरे दिन स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर समस्त राजोचित आभूषणोंसे विभूषित हो राजसभामें द्वारपर स्थित मदोन्मत्त गजराजोंकी भाँति सुशोभित होने लगे। वे राजा युधिष्ठिरको आगे करके विराटकी सभामें गये और राजाओंके लिये रखे हुए सिंहासनोंपर बैठे। उस समय वे भिन्न-भिन्न यज्ञवेदियोंपर प्रज्वलित अग्नियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे
vaiśampāyana uvāca |
virāṭasya sabhāṃ gatvā bhūmipālāsaneṣv atha |
niṣeduḥ pāvakaprakhyāḥ sarve dhiṣṇyeṣv ivāgnayaḥ ||
毗湿摩波耶那说:他们来到毗罗吒王的朝会,便坐上为诸王设下的宝座。众人皆如火焰般辉耀,端坐其上,宛若各自祭坛上燃起的圣火。
वैशम्पायन उवाच