Adhyāya 61: Saṃmohana-astra and the Kuru Withdrawal (संमोहनास्त्रं तथा कुरुनिवृत्तिः)
नाददानं न संधानं न मुछ्चन्तं शरोत्तमान् । त्वामहं सम्प्रपश्यामि पश्यन्नपि न चेतन:,“आप कब उत्तम बाणोंको हाथमें लेते, कब धनुषपर रखते और कब उन्हें छोड़ते हैं, यह सब मैं नहीं देख पाता और देखनेपर भी मुझे चेत नहीं रहता
nādadānaṃ na sandhānaṃ na muñcantaṃ śarottamān | tvām ahaṃ samprapaśyāmi paśyann api na cetanaḥ ||
毗舍摩波耶那说道:“我竟看不出你何时取起上等利箭,何时搭上弓弦,何时放出。纵然我目不转睛地注视,你的神速与精妙的弓术仍使我的知觉失灵,仿佛诸感官都被震慑。”
वैशम्पायन उवाच