अध्याय ५८ — वानरध्वजस्य महेन्द्रास्त्रप्रयोगः
Chapter 58: Arjuna’s Deployment of the Indra-Weapon
द्रोणं हि समरे को5न्यो योद्धुमहति फाल्गुनात् । रौद्र: क्षत्रियधर्मोडयं गुरुणा यदयुध्यत । इत्यब्रुवञ्जनास्तत्र संग्रामशिरसि स्थिता:,“भला, युद्धमें अर्जुनके सिवा दूसरा कौन द्रोणाचार्यका सामना कर सकता है? यह क्षत्रियधर्म कितना भयंकर है कि शिष्यको गुरुसे युद्ध करना पड़ा है।” इस प्रकार वहाँ युद्धके मुहानेपर खड़े हुए योद्धा आपसमें बातें करते थे
droṇaṁ hi samare ko 'nyo yoddhum arhati phālgunāt | raudraḥ kṣatriyadharmo 'yaṁ guruṇā yad ayudhyata | ity abruvañ janās tatra saṅgrāma-śirasi sthitāḥ |
“战场之上,除法尔古那(阿周那)之外,还有谁堪与德罗那对阵?刹帝利之法何其惨烈,竟使弟子不得不与自己的师长交锋!”于是,立于交战最前沿的诸勇士彼此低语——既惊叹德罗那无双之威,又感叹战争所迫之伦理代价,连师徒这般神圣之纽带亦难免被撕裂。
वैशम्पायन उवाच