Adhyāya 55: Pārtha–Rādheya Saṃvāda and Tactical Exchange
Chapter 55
अतन्र मध्ये यथार्कस्य रश्मयस्तिग्मतेजस: । दिशासु च तथा राजन्नसंख्याता: शरास्तदा,राजन! जैसे प्रचण्ड तेजवाले सूर्यदेवकी किरणें एक पात्रमें नहीं अँट सकतीं, उसी प्रकार उस समय सम्पूर्ण दिशाओंमें फैले हुए अर्जुनके असंख्य बाण आकाशमें समा नहीं पाते थे
大王啊!正如烈日锋芒般的光芒不可能容纳于一器之中,那时阿周那无量之箭遍布诸方,竟似连苍穹也难以容受。
वैशम्पायन उवाच