द्रोण-पार्थ-युद्धम्
Droṇa–Pārtha Strategic Engagement
युद्धमें बाणोंकी मार खाकर कौरवसैनिक धराशायी होते जा रहे थे, तो भी उनका मन वहाँसे भागनेको नहीं होता था। वे मन-ही-मन अर्जुनकी फुर्तीकी सराहना करते थे ।। ततः शड्खं प्रदध्मौ स द्विषतां लोमहर्षणम् । विस्फार्य च धनु:श्रेष्ठ ध्वजे भूतान्यचोदयत्,तदनन्तर पार्थने अपना शंख बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। फिर उन्होंने अपने श्रेष्ठ धनुषकी टंकार करके ध्वजापर बैठे हुए भूतोंको सिंहनाद करनेकी प्रेरणा दी
tataḥ śaṅkhaṃ pradadhmau sa dviṣatāṃ lomaharṣaṇam | visphārya ca dhanuḥśreṣṭhaṃ dhvaje bhūtāny acodayat ||
纵然在战斗中被箭矢击中,俱卢军士卒接连倒下,他们的心却并不想从那里逃走;他们在心中称赞阿周那的敏捷。随后,帕尔塔吹响海螺,其声令敌军毛发悚立。继而他振响上乘之弓,使弓弦轰鸣,又仿佛催动旗帜上所驻的诸灵发出狮子般的咆哮——此举既振奋己方斗志,也在正义战怒之中将恐惧投向对阵的行列。
वैशम्पायन उवाच