उत्तरो भयविषण्णः — बृहन्नडेन धैर्योपदेशः
Uttara’s Panic and Bṛhannadā’s Stabilizing Counsel
वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा तदर्जुनो वाक्यं राज्ञ: पुत्रस्य भाषत: । अतीतसमये काले प्रियां भार्यामनिन्दिताम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार बोलते हुए राजकुमार उत्तरकी वह बात सुनकर सब बातोंमें कुशल अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। उस समयतक उनके अज्ञातवासकी अवधि पूरी हो गयी थी। अतः उन्होंने अपनी सतीसाध्वी प्यारी पत्नी पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको, जिसका अमग्निसे प्रादुर्भाव हुआ था और जो तन््वंगी, सत्य-सरलता आदि सदगुणोंसे विभूषित तथा पतिके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाली थी, एकान्तमें बुलाकर कहा--“कल्याणि! तुम मेरी बात मानकर राजकुमार उत्तरसे शीघ्र इस प्रकार कहो -
vaiśampāyana uvāca | śrutvā tad arjuno vākyaṁ rājñaḥ putrasya bhāṣataḥ | atīta-samaye kāle priyāṁ bhāryām aninditām ||
毗湿摩耶那说道:“大王啊!阿周那——诸事皆精之人——听到王子所言,心中大喜。因为到那时,他隐姓埋名的期限已满;于是他私下召来自己所钟爱的、无可指摘的妻子,意欲以审慎而合乎时宜的方式行事。”
वैशम्पायन उवाच