Virāṭa-parva, Adhyāya 12 — Concealed Service in Matsya and Bhīma’s Arena Victory
विराट उवाच ददामि यानानि धन निवेशनं ममाश्वसूतो भवितु त्वमहसि । कुतो5सि कस्यासि कथं त्वमागत: प्रत्रूहि शिल्पं तव विद्यते च यत्,विराटने कहा--भद्र पुरुष! मैं तुम्हें सवारी, धन और रहनेके लिये घर देता हूँ। तुम मेरे घोड़ोंको शिक्षा देनेवाले सारथि हो सकते हो, किंतु मैं पहले यह जानना चाहता हूँ कि तुम कहाँसे आये हो? किसके पुत्र हो और किसलिये तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है? तुममें जो कला-कौशल हो, उसे भी बताओ
virāṭa uvāca | dadāmi yānāni dhana-niveśanaṃ mamāśvasūto bhavitu tvam arhasi | kuto 'si kasyāsi kathaṃ tvam āgataḥ prabrūhi śilpaṃ tava vidyate ca yat |
毗罗吒说道:“善男子,我赐你乘舆、财物,并在我宫中给你居所。你足以做我的训马者与御者。然而在此之前,我愿知:你从何处来?是谁之子?为何来到此地?也请说出你所具备的技艺与本领。”
विराट उवाच