Virāṭa-parva, Adhyāya 12 — Concealed Service in Matsya and Bhīma’s Arena Victory
स वै हयानैक्षत तांस्ततस्तत: समीक्षमाणं स ददर्श मत्स्यराट् । ततोअब्रवीत् ताननुगान् नरेश्वर: कुतो5यमायाति नरो5मरोपम:,आते ही उन्होंने इधर-उधर घूमकर घोड़ोंको देखना प्रारम्भ किया। इस प्रकार उन अश्वोंका निरीक्षण करते समय उन्हें मत्स्यराज विराटने देखा। तब वे नरेश वहाँ बैठे हुए अनुचरोंसे बोले--“पता तो लगाओ, यह देवोपम पुरुष कहाँसे आ रहा है? यह बिना कहे- सुने स्वयं मेरे घोड़ोंको बहुत ध्यानसे देख रहा है; अत: यह अवश्य घोड़ोंको पहचाननेवाला और अअभश्वविद्याका विद्वान् होगा। इसलिये इसे शीघ्र मेरे समीप ले आओ। यह वीर देवताओंकी भाँति सुशोभित हो रहा है”
sa vai hayān aikṣata tāṁs tatas tataḥ samīkṣamāṇaṁ sa dadarśa matsyarāṭ | tato 'bravīt tān anugān nareśvaraḥ kuto 'yam āyāti naro 'maropamaḥ |
他开始察看群马,目光在一匹又一匹之间巡行。正当他细致检视之时,摩蹉国王毗罗吒看见了他。于是人中王对侍从说道:“查明这位神采如天神的男子从何而来。他不问也不被问,便专注察看我的马;必是识马之人,精通御马之术。速速带他来见我——此英雄光耀如诸天。”
वैशम्पायन उवाच