कर्कोटक-उपदेशः
Karkoṭaka’s Counsel and Nala’s Concealment
कथं नु राज॑स्तृषित: क्षुधित: श्रमकर्षित: । सायाह्ले वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि,“राजन! आप भूखे-प्यासे और परिश्रमसे थके-माँदे होकर जब सायंकाल किसी वृक्षके नीचे आकर विश्राम करेंगे, उस समय मुझे अपने पास न देखकर आपकी कैसी दशा हो जायगी?”
kathaṁ nu rājan tṛṣitaḥ kṣudhitaḥ śramakarṣitaḥ | sāyāhle vṛkṣamūleṣu mām apaśyan bhaviṣyasi ||
“大王啊,当你饥渴交迫、劳顿困乏;傍晚时分在树根下歇息,却不见我在侧——那时你将如何自处?”
ब॒हृदश्चव उवाच