अध्याय ३३ — कर्म, दैव, हठ, स्वभाव और पुरुषार्थ पर द्रौपदी का उपदेश
Draupadī on Action, Fate, and Human Effort
सक्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेद शिथिलं मन: । वीर्यमास्थाय कौरव्य धुरमुद्वह धुर्यवत्,“कुरुनन्दन! अपने हृदयको क्षत्रियोचित उत्साहसे भरकर मनकी इस शिथिलताको दूर करके पराक्रमका आश्रय ले आप एक धुरन्धर वीर पुरुषकी भाँति युद्धका भार वहन कीजिये
vaiśampāyana uvāca | sakṣātraṁ hṛdayaṁ kṛtvā tyaktveda śithilaṁ manaḥ | vīryam āsthāya kauravya dhuram udvaha dhuryavat ||
毗湿摩波耶那说道:“拘卢之裔啊,使你的心真正具足刹帝利之气;抛却这心志的懈怠。依凭勇武,像最卓越的勇士那样,担起战阵之重。”
वैशम्पायन उवाच