प्रमृज्याश्रूणि नेत्रा भ्यां सावित्री धर्मचारिणी । यदि मे<स्ति तपस्तप्तं यदि दत्त हुतं यदि,वश्रृश्चशुरभर्तृणां मम पुण्यास्तु शर्वरी । अपने पतिको इस प्रकार शोकसे कातर हुआ देख धर्मका पालन करनेवाली सावित्रीने नेत्रोंसे बहते हुए आँसुओंको पोंछकर कहा--“यदि मैंने कोई तपस्या की हो, यदि दान दिया हो और होम किया हो तो मेरे सास-ससुर और पतिके लिये यह रात पुण्यमयी हो
pramṛjyāśrūṇi netrābhyāṃ sāvitrī dharmacāriṇī | yadi me 'sti tapas taptaṃ yadi dattaṃ hutaṃ yadi, śvaśrūś ca śvaśurabhartṝṇāṃ mama puṇyāstu śarvarī |
萨维特丽——奉行达摩者——拭去双眼的泪水,说道:“若我确曾修习苦行,若我确曾施舍布施,若我确曾在祭祀中奉献供物,则愿今夜为我的婆母、公公与夫君带来吉祥与功德。”
मार्कण्डेय उवाच