Ajñātavāsa-saṅkalpaḥ — Yudhiṣṭhira’s Resolve and Dhaumya’s Exempla on Concealment
वरातिसर्ग: शतपुत्रता मम त्वयैव दत्तो ह्वियते च मे पति: । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं तवैव सत्यं वचनं भविष्यति,आपने ही मुझे सौ पुत्र होनेका वर दिया है और आप ही मेरे पतिको अन्यत्र लिये जा रहे हैं; अतः मैं वही वर माँगती हूँ कि ये सत्यवान् जीवित हो जायूँ, इससे आपका ही वचन सत्य होगा
“赐我百子之愿,正是你亲口所许;而今带走我夫君的,也正是你。故我求此愿:愿萨提亚梵得以生还,如此你的言语方得成真。”
यम उवाच