Ajñātavāsa-saṅkalpaḥ — Yudhiṣṭhira’s Resolve and Dhaumya’s Exempla on Concealment
सो$भिगम्य प्रियां भार्यामुवाच श्रमपीडित: । लकड़ी चीरते समय परिश्रमके कारण उनके शरीरसे पसीना निकल आया और उसी परिश्रमसे उनके सिरमें दर्द होने लगा। तब वे श्रमसे पीड़ित हो अपनी प्यारी पत्नीके पास जाकर बोले--,यम उवाच निवर्त तुष्टोडस्मि तवानया गिरा स्वराक्षरव्यज्जनहेतुयुक्तया । वरं वृणीष्वेह विनास्य जीवितं ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् यमराज बोले--अनिन्दिते! तू लौट जा। स्वर, अक्षर, व्यंजन एवं युक्तियोंसे युक्त तेरी इन बातोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तू यहाँ मुझसे कोई वर माँग ले। सत्यवानके जीवनके सिवा मैं और सब कुछ तुझे दे सकता हूँ
so 'bhigamya priyāṃ bhāryām uvāca śramapīḍitaḥ | yama uvāca nivarta tuṣṭo 'smi tavānayā girā svarākṣaravyañjanahetuyuktayā | varaṃ vṛṇīṣveha vināsya jīvitaṃ dadāni te sarvam anindite varam ||
他因劳顿而疲惫,走到心爱的妻子身边开口说话。随后阎摩说道:“无瑕之女,回去吧。我对你的言辞极为欢喜——元音、音节、辅音皆整饬周全,又合乎严密的论理。你在此向我求一愿;除去萨提亚梵(Satyavān)的性命之外,任何无可指摘的恩赐,我都可赐予你。”
मार्कण्डेय उवाच