द्वैतवनगमनम् (Dvāitavana-gamanam) — Journey and Settlement at Dvaita Forest-Lake
सर्वाणि भूतानि नरेन्द्र पश्य तथा यथावद् विहितं विधात्रा । स्वयोनित: कर्म सदा चरन्ति नेशे बलस्येति चरेदधर्मम्,नरेन्द्र! देखो, ये समस्त प्राणी विधाताके विधानके अनुसार अपनी योनिके अनुरूप सदा कार्य करते रहते हैं, अत: अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म न करे
马尔坎德耶说道:“噢,国王!观诸众生:造物主既已如法安立,它们便恒常依其本生之类(yoni)而行其业。故切莫自恃为力量之主而行非正法(adharma)。”
मार्कण्डेय उवाच