Karṇa’s Counsel on Śrī
Fortune) and the Proposed Display before the Exiled Pāṇḍavas (कर्णवचनम् / श्रीप्रदर्शन-प्रस्तावः
करिष्यसि न चेदेवं मृतां मामुपधारय । अहमज्ञिरसो भार्या शिवा नाम हुताशन । शिशक्रि: प्रहिता प्राप्ता मन्त्रयित्वा विनिश्चयम्,मार्कण्डेयजी कहते हैं--नरेश्वर! अंगिराकी पत्नी शिवा शील, रूप और सदगुणोंसे सम्पन्न थी। सुन्दरी स्वाहादेवी पहले उसीका रूप धारण करके अग्निदेवके निकट गयी और उनसे इस प्रकार बोली--“अग्ने! मैं कामवेदनासे संतप्त हूँ, तुम मुझे अपने हृदयमें स्थान दो। यदि ऐसा नहीं करोगे तो यह निश्चय जान लो, मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। हुताशन! मैं अंगिराकी पत्नी हूँ। मेरा नाम शिवा है। दूसरी ऋषि-पत्नियोंने सलाह करके एक निश्चयपर पहुँचकर मुझे यहाँ भेजा है”
kariṣyasi na ced evaṁ mṛtāṁ mām upadhāraya | aham aṅgiraso bhāryā śivā nāma hutāśana | śiśkriḥ prahitā prāptā mantrayitvā viniścayam |
“若你不肯如此,便当知我与死无异。火焰者(Hutāśana)啊,我乃安吉罗娑之妻,名为湿婆(Śivā)。诸仙之妻已共议而定,决意既成,遂遣我至此。”
मार्कण्डेय उवाच