सत्यभामया द्रौपद्याश्वासनम्
Satyabhāmā’s Consolation of Draupadī
तब केशीने कुपित होकर इन्द्रपर पर्वतकी एक चट्टान फेंकी। राजन्! उस शैलशिखरको अपने ऊपर सरिता देख इन्द्रने वज़से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और वह चूर-चूर होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय गिरते हुए उस शिलाखण्डने केशीको ही भारी चोट पहुँचायी ।। हित्वा कन्यां महाभागां प्राद्रवद् भूशपीडित: । अपयाते<सुरे तस्मिंस्तां कनन््यां वासवो<ब्रवीत् | कासि कस्यासि किज्चेह कुरुषे त्वं शुभानने,उस आधघातसे अत्यन्त पीडित हो वह दानव उस परम सौभाग्यशालिनी कन्याको छोड़कर भाग गया। उस असुरके भाग जानेपर इन्द्रने उस कन्यासे पूछा--'सुमुखि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और यहाँ क्या करती हो?”
hitvā kanyāṁ mahābhāgāṁ prādravad bhūśapīḍitaḥ | apayāte 'sure tasmiṁs tāṁ kanyāṁ vāsavo 'bravīt | kāsi kasyāsi kiṁ ceha kuruṣe tvaṁ śubhānane ||
当时克西怒起,向因陀罗掷出一块山岩。大王啊!因陀罗见那山巅巨石直压己身,便以金刚杵将其劈成碎片,碎屑纷纷坠地。就在那一刻,坠落的石块反而重创了克西自身。那阿修罗被此击打折磨得难以忍受,遂抛下那位福相殊胜的少女,仓皇逃遁。待其远去,婆娑婆(Vāsava,因陀罗)便问那少女:“容颜端美者,你是谁?是谁的女儿?又为何在此?”
युधिषछ्िर उवाच