Dvārakā’s Distress and the Saubha Engagement (द्वारकाव्यग्रता तथा सौभयुद्धम्)
न तस्योरसि नो मूर्थ्नि न काये न भुजद्धये । अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्याम्यनिचितं शरै:,पाण्डवश्रेष्ठ! उसकी छातीमें, मस्तकपर, शरीरके अन्य अवयवोंमें तथा दोनों भुजाओंमें थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं दिखायी देता था, जिसमें बाण न चुभे हुए हों। जैसे मेघके वर्षा करनेपर गेरू आदि धातुओंसे युक्त पर्वत लाल पानीकी धारा बहाने लगता है, वैसे ही वह बाणोंसे छिदे हुए अपने अंगोंसे भयंकर रक्तकी धारा बहा रहा था
na tasyorasi no mūrdhni na kāye na bhujadvaye | antaraṃ pāṇḍavaśreṣṭha paśyāmyanicitaṃ śaraiḥ ||
风神婆由说道:“般度诸子中最卓越者啊,我看不见他胸前、头顶、全身或双臂上有任何一处空隙不被箭矢贯穿。正如富含赤色矿砂的山岳,一旦被雨云浇灌,便倾泻出殷红的水流;他亦如是——四肢被箭杆穿透成孔——放出骇人的血之洪流。”
वायुदेव उवाच